दवा रिएक्शन से शरीर काला पड़े एक रुग्णा की चिकित्साऽनुभव !!



                अंग्रेजी चिकित्सा का कुप्रभाव मानव को झेलना ही पड़ रहा है, एक रोग की दवा होते-होते दूसरा रोग पैदा हो जाता है। शुगर की दवा खाते जाते हैं और कुछ सालों बाद किडनी फेल हो जाती है। थायराइड की दवा खाते ब्लडप्रेशर शुगर और किडनी फेल्योर होते देखा जा रहा है। इस प्रकार अंग्रेजी चिकित्सा के ऐसे-ऐसे गंभीर दुष्परिणाम आ रहे हैं जिसके बारे में लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे।

श्रीमती सुमन जी 

            १४ जून २०२० को मेरठ (उ.प्र.) से श्रीमती सुमन सिंह (४० वर्ष) अपने पति कृष्णपाल सिंह के साथ आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चित्रकूट आयीं। उनके बेटे के आर्थ्रराइटिस का और सुमन सिंह के पैरों के दर्द का इलाज पहले से चल रहा था और उन्हें आराम भी हो गया था।
            १५ मई २०२० के आस-पास सुमन सिंह को बुखार आया, उनके पति सेल टैक्स विभाग में हैं वे मेरठ के एक अंग्रेजी हास्पिटल में ले गये उन्होंने एण्टीबायोटिक, एण्टीपायरेटिक दवा दीं। सुमन जी ने इन्हें खाया, शरीर में खुजली होने लगी, दवा बन्द करने पर खुजली तो बन्द हो गयी पर पूरा शरीर काला पड़ गया। उन्होंने स्किन के डॉक्टर को दिखाया, उन्होंने कुछ दवायें दीं पर लाभ नहीं हुआ। वे निजी गाड़ी से अपने पति सहित तुरन्त आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट पहुँचीं। रजिस्ट्रेशन कराया, अपना क्रम आने पर ओपीडी में आये। ओपीडी में बैठते ही ही श्रीमती सुमन जी के आँसू आ गये बोलीं, सर! देखिए क्या हो गया? मैं काली पड़ गयी। सुमन जी की पूरी केसहिस्ट्री ली गयी, उन्होंने पूरी बात फिर दोहरायी। उनके रोग की वास्तविक सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हुयी थी-

            रुक्ष तीक्ष्ण उष्ण अंग्रेजी दवाओं का सेवन (लवणाम्लकटुक्षारस्निग्धोष्णाजीर्णभौजनै:) च.चि. ९/५।।

            रक्तदुष्टि ➡️ स्वकारणों से वात प्रकोप ➡️ त्वचा, मांस में आश्रय ➡️ त्वचा में कालापन। (जैसा कि चरक बताते हैं-)

कण्डूदाहरुगायामतोदस्फुरणकुञ्चनै:। अन्विता श्यावरक्ता त्वग्बाह्ये ताम्रा तथेष्यते।। च.चि. २९/२०।।

            ध्यान रखने की बात है कि शुद्ध रक्त, पित्त और तेजोमहाभूत प्रधान होता है यदि वात दोष से यह दूषित होता तो त्वचा में कालापन आ जाता है-

तत्रवातवृद्धौ वाक्पारुष्यं काश्र्यं काष्ण्र्यंम्।। सु.सू. १५/१७।।

    आचार्य सुदान्तसेन ने भी मा.नि. की मधुकोष टीका में नानात्मज वात विकारों में श्याववर्णता (त्वचा का श्याव होने) की बात की।
    आचार्य सुश्रुत ने सु.सू. १४/२१ में वातदोष से प्रभावित रक्त में कालापन होने की स्थिति बतायी है।

तत्र फेनिलमरुणं कृष्णं परुषं तनु . . . ।। सु.सू. १४/२१।।

            महर्षि चरक सूत्र २४/२४ में भी स्पष्ट कहते हैं कि जिसकी त्वचा का रंग विकृत हो गया हो, इन्द्रियाँ म्लान हों, अपने-अपने विषयों का सही ढंग से ग्रहण करने में असमर्थ हों, पाचनक्रिया गड़बड़ हो, व्यक्ति दु:खी, असंतुष्ट हो तथा निर्बलता महसूस करता हो उसके रक्त में विकार हैं ऐसा जान लें।
            इस प्रकार यह स्पष्ट हो रहा था कि रुक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण अंग्रेजी दवाओं ने वातवृद्धि कर इनके रक्त को उसी तरह दूषित कर दिया जैसे वातरक्त में होता है।
            दरअसल सही सम्प्राप्ति ज्ञान के बाद चिकित्सा व्यवस्था क्रम का चयन बहुत ही सहज हो जाता है। हमने श्रीमती सुमन जी को कहा कि आपको यहाँ रहना पड़ेगा, वे तैयार होकर ही आयी थीं।
            चिकित्साक्रम ऐसा जो सम्प्राप्ति विघातक तो ही हो साथ ही धातु विकृति से हुये शारीरिक विकृति, निर्बलता, अप्रसन्नता, पाचनतंत्र की गड़बड़ी, अनिद्रा को भी दूर करे। केवल स्निग्ध, शीत, मधुर, वातानुलोमक और अग्निसमकारक चिकित्सा देनी है।

            निम्नांकित चिकित्सा क्रम तैयार किया गया-
१.    वासाघृत का स्नेहपान महर्षि चरक का निर्देश है कि-

सर्पिस्तैलवसामज्जापानाभ्यञ्जानवस्तिभि:।
सुखोष्णैरुपानाहैश्च वातोत्तरमुपाचरेत्।।
च.चि. २९/४४।।

            किन्तु श्रीमती सुमन जी घृतपान के नाम पर विचित्र सा मुँह बनाती थीं। किन्तु घृत का प्रयोग आवश्यक तो था ही, सो हमने नर्सों को निर्देश दिया कि वासाघृत को शास्त्र के निर्देशानुसार (.....भ्यञ्जानवस्तिभि:।।) के अनुसार अनुवासनवस्ति के रूप में दें।
२.   चोपचीनी चूर्ण ३-३ ग्राम सुखोष्ण जल से दिन में २ बार।
३.   निम्बादि क्वाथ १५ मि.ली., वासागुडूची क्वाथ १५ मि.ली. बराबर पक्व जल मिश्रित कर भोजन के ३० मि. पूर्व।
४.   चन्द्रकला रस मु.यु. २ गोली, रसमाणिक्य ६५ मि.ग्रा., मंजिष्ठा घनसत्व ५०० मि.ग्रा. और त्रिफला चूर्ण १ ग्राम, स्वर्णभस्म २५ मि.ग्रा. मिलाकर। १*२ अकृत मुद्गयूष अनुपान से।

पथ्य में- कृताकृत यूष, पेया, रोटी, गोघृत, द्राक्षावलेह, परवल, तुरई लौकी आदि।
            एक सप्ताह में ही ऐसा आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया जो परिवर्तन १ माह में अंग्रेजी डॉक्टर नहीं कर पा रहे थे और दो सप्ताह में श्रीमती सुमन जी की ९० प्रतिशत कालिमा मिट गयी।

            जाते-जाते समय श्रीमती सुमन जी ने अपने विचार इस प्रकार प्रकट किये-


            मेरा नाम सुमन सिंह है, मेरी उम्र ४० साल है, मैं मेरठ से हूँ। मेरे पति सेल टैक्स विभाग में हैं।
            मेरे घुटनों का इलाज आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालय चित्रकूट में ३ माह से चल रहा था, मुझे खूब लाभ था। एक दिन मुझे घर में बुखार आ गया, गला सूखने लगा, मैं चित्रकूट तो जाना चाहती थी लेकिन कोविड-१९ के कारण मुझे मजबूरन एलोपैथिक हॉस्पिटल मेरठ में ही दिखाना पड़ा।
            मैंने जैसे ही अंग्रेजी दवा खायी, तो मेरा पूरा शरीर काला पड़ गया, फिर मैंने चर्म रोग के डॉक्टर को दिखाया, उन्होंने भी एक माह तक दवा की पर रोग बढ़ता ही जा रहा था। मैं घबरा गयी और मैं चित्रकूट पहुँची। वहाँ उन्होंने मुझे आश्वासन दिया और १५ दिन रखकर चिकित्सा की। आज मैं १५ दिनों में फिर से पहले जैसी हो गयी और मेरा कालापन ९० प्रतिशत हट गया।
            मैं बहुत खुश हूँ, कि मैं पहले जैसे हो सकी। मैं इस आयुष चिकित्सा संस्थान का बहुत आभार व्यक्त करती हूँ।

            मैं तो कहती हूँ कि देश की प्रमुख चिकित्सा आयुष हो और डॉ. वाजपेयी जैसे सुयोग्य चिकित्सक हों।

सुमन सिंह पत्नी श्री कृष्ण पाल सिंह
ग्रिनविड सिटी, मेरठ (उ.प्र.)

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