दर्द में फेल हुयी हाई एण्टीबायोटिक और पेन किलर : कामयाब आयुर्वेद !!


भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का अपस्मार के निदान पर लेक्चर चल रहा था, उन्होंने शिष्यों को एक सूत्र दिया-

एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते।
व्याधेरकेस्य चानेका बहूनां बह्वय एव च।।
च.नि. ८/३०।।
            एक चिकित्सा द्वारा भी अनेकों रोगों की शान्ति हो जाती है और एक व्याधि की चिकित्सा भी अनेक प्रकार से की जाती है। आगे भगवान् पुनर्वसु आत्रेय यह भी स्पष्ट निर्देश दे देते हैं कि चिकित्सक, औषध, परिचारक और रोगी के अनुचित और गुणहीन प्रयोग से रोग की अवस्था तक परिवर्तित हो जाती है। (च.चि. ८/३५)

श्री विनय सिंह भदौरिया 

            १ मार्च २०२० को श्री विनय सिंह भदौरिया उम्र ३२ वर्ष, चाकघाट रीवा (म.प्र.) को उनके पिता श्री भरत सिंह जो रीवा के प्रसिद्ध वकील हैं लेकर आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट आये। इन्हें यहाँ जाने की सलाह चाकघाट, रीवा के प्रतिष्ठित गौतम परिवार ने दी थी। यह परिवार इतना कृतज्ञ और परोपकारी है कि जबसे श्री जगदीश प्रसाद गौतम जी को आयुष ग्राम ट्रस्ट ने रीढ़ के ऑपरेशन से बचाकर चला दिया तब से न जाने कितने रोगियों को वे स्वयं यहाँ लाकर/भेजकर पीड़ित मानव की सेवा कर चुके।


            रोगी शरीर से पुष्ट, जवान पर १५ दिन से गुदा मार्ग से ऐसा भयंकर रक्तस्राव (Bleeding) की पूरे कपड़े खराब हो रहे थे। पीड़ा इतनी भयंकर कि वह जवान कराह रहा था।
            केसहिस्ट्री में उसने बताया इन १५ दिनों में अच्छा से अच्छा एलोपैथ इलाज लिया पर दर्द, टीस में बिल्कुल राहत नहीं मिल रही। डॉक्टरों ने हाई एण्टीबायोटिक और पेन किलर दिये। यदि किसी पेन किलर से दर्द में थोड़ा आराम भी मिलता तो ब्लीडिंग बढ़ जाती थी। युवक ऑपरेशन कराना नहीं चाहता। हमने लिटाकर देखा तो गुदा में सूजन भी थी, दोनों नितम्बों में भी स्रवित रक्त लगा था। एक बार झटके में तो हमें लगा कि हम रोगी को वापस कर दें पर रोगी और उनके साथ के लोग बहुत बड़ा विश्वास लेकर आते हैं।
            हमारा हजारों बार का अनुभव है कि कर्तव्य विमूढ़ावस्था में गुरु कृपा, शास्त्र और इष्टसाधना प्रत्यक्ष होकर लोककल्याण हेतु मार्गदर्शन करती है।
            आचार्य चरक कहते हैं-

ज्ञानार्थं यानि चोक्तानि व्याधिलिङ्गानि संग्रहे।
व्याधयस्ते तदात्वे तु लिङ्गानीष्टानि नामय:।।
च.नि. ८/४०।।
            रोगों के साथ रोग लक्षणों को पृथक्-पृथक् नहीं देखना चाहिए क्योंकि रोग लक्षण स्वतंत्र नहीं होते, इसीलिए प्रधान की चिकित्सा से अप्रधान का शमन होने लगता है।
            रोग के निदान क्रम में रोग की प्रधान सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हुयी-
            मन्दाग्नि + वातवर्धक निदान सेवन ➡️ वातप्रधान त्रिदोष प्रकोप + रक्तप्रकोप ➡️ मुख्य धमनी द्वारा गुदा में स्थानसंश्रय ➡️ गुदवलियों में मांसवत् कठिन अंकुर ➡️ भयंकर वेदना।
 जब तात्कालिक वेदना सम्प्राप्ति पर विचार किया तो सम्प्राप्ति घटक ऐसे पाया-
            पित्तप्रवद्ध वय: (युवावयजन्य पित्तवृद्धि) किन्तु वातानुबन्ध ➡️ गाढविट्ता (मल का कड़ा होना) और उसका दबाव पड़ना ➡️ पित्त और वात दोष से दूषित गरम-गरम रक्त स्राव ➡️ वर्ण, शारीरिक बल, उत्साहक्षीणता तथा ओजोधातु का ह्रास। यानी (रक्तार्श का उपद्रव)।

इस सम्प्राप्ति में वाग्भट्टोक्त रक्तार्श के सभी लक्षण थे-

रक्तोल्वणा गुदेकीला: पित्ताकृतिसमन्विता:।
वटप्ररोहसदृशा गुञ्जाविद्रुमसान्निभा:।।
तेऽत्यर्थं दुष्टमुष्णं च गाढविरप्रतिपीडिता:।
भेकाभ: पीडयन्ते दु:खै शोणितक्षयसम्भवै:।
हीनवर्णबलोत्साहो हतौजा: कलुषेन्द्रिय:।।
अ.नि. ७/४३-४५।।
            इस प्रकार यह तथ्य सामने आया कि रोग ने रोगी के मन और शरीर दोनों को पीड़ित कर रखा था, उत्साह और कलुषेन्द्रियता मानसिक लक्षण हैं तथा हीन वर्णता और दुर्बलता शरीर के लक्षण हैं।
            जो कमर, जंघा, गुदा में दर्द और कमजोरी थी वह वातानुबन्धता के कारण थी-

‘‘कट्ज्यूरुगुदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम्।।’’
१४/१७१।।
रोगी विनय सिंह ने हल्के ज्वर की सी अनुभूति की बात कही, भोजन से द्वेष और आवाज में अल्पता थी ही। तभी हमें ध्यान आया कि भगवान् धन्वन्तरि सुश्रुत उत्तर तंत्र ३९/३९ में एक हतौजस ज्वर का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि- नात्युष्णशीतोल्पसंज्ञो भ्रान्तपेक्षी हतास्वर ... ... ... तमभिन्यासमित्याहुर्हतौजमथापरे।।
 इसमें मृदु ज्वर, अल्पसंज्ञता, चित्त की अस्थिरता, स्वरनाश, जिह्वा में खरता, गला सूखना, मल-मूत्र की रुकावट, भोजन में द्वेष होते हैं।
            चूँकि हर्ष और उत्साह का जनक वायु है और यह भी ध्यातव्य विषय है कि इन्द्रियों को सामर्थ्यवान् और कार्यवान् वायुही बनाता है तथा बल और वर्ण के नाश में वायु ही कारण बनता है। (चरक सूत्र १२/७) तथा वातादृते नास्ति रुजा(सुश्रुत १७/११) के अनुसार वायु ही पीड़ा का कारण है, इस प्रकार जितना वायु का प्रकोप उतनी पीड़ा। जितना वायु प्रकोप उतना ही दौर्बल्य। जितना वायु प्रकोप उतना ही धातुक्षय। जितना धातुक्षय उतना वायु प्रकोप और ओजक्षय।
 क्योंकि
अभिघातात्क्षयात्कोपाच्छोकाद् ध्यानाच्छ्रमात्क्षुध:।।
सु.सू. १५/२८।।
जितना वायु प्रकोप उतनी ही इन्द्रियों की असमर्थता और कलुषेन्द्रियता।
            इतनी गहराई से विचार करते समय हम कफपर भी ध्यान रखेंगे क्योंकि शरीर में कफ का संतुलन बलको बनाये रखता है और ओजकी स्थिति को भी, तभी तो व्याधि क्षमत्व शक्ति रहेगी। जब यह विकृत होगा तो विकार पैदा कर ही देगा।
प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा ... स चैवोज: ... च पाप्म:।।
 च.सू. १७/११७
 संतुलित अवस्था का कफ भी उत्साह और बुद्धि को ठीक रखता है। क्योंकि यह ओजसधर्मी है न। (च.सू. १२/७)
            जब शरीर में वात बढ़ेगा तो कफ की मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तरह की क्षीणता होगी।
            अब एक प्रश्न बनता है कि एक रक्तार्श और सारे दोषों की भूमिका?
            हाँ! बिल्कुल सही! इसमें पाँच वायु, पाँच पित्त, पाँच कफ तथा प्रवाहिणी, विसर्जनी और संवरणी ये तीनों गुदवलियाँ इस प्रकार १८ प्रकोप बनते हैं।
पञ्चात्मा मारुत: पित्तं कफो गुदवालित्रयम्।
सर्व एव प्रकुप्यन्ति गुदजानां समुद्भवे।।
च.चि. १४/२३।।
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            जब रोगी ने एण्टीबायोटिक और हैवी पेन किलर के नाम व प्रयोग की बात बतायी तो सामान्यत: तो यही विचार आयेगा कि जब इतने पेन किलर राहत नहीं पहुँचा पाये तो आयुर्वेद में क्या होगा?


            लेकिन चरक तो चरक हैं उनके दो सूत्र ऐसे में बहुत अच्छा मार्गदर्शन कर ही देते हैं।
१.    यत्तु प्रक्षीणदोषस्य रक्तं वातोल्वणस्य च।
वर्तते स्नेहसाध्यं तत्पानाभ्यंगानुवासनै:।।
च.चि. १४/१८३।।
२.    रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम्।।
च.चि. १४/१९६।।
            यानी अतिवर्तमाने रक्ते च शूले घृतं विधातव्यम्।। रक्तार्श पीड़ित रोगी को अधिक रक्तस्राव हो रहा हो और दर्द भी अधिक हो तो औषध सिद्ध घृत का प्रयोग करना चाहिए।
            आचार्य के इस निर्देश को ध्यान रखते हुये हमने पंचतिक्तघृत गुग्गुल का चुनाव किया और आयुष ग्राम के नर्सिंग स्टॉफ को २० मि.ली. मात्रा पिलाने का निर्देश दे दिया और दूसरे दिन से २०-२० मि.ली. सुबह-शाम खाली पेट सेवन कराने का निर्देश।
            इसके साथ निम्नांकित औषध योग जो ओजवर्धक, वातशामक, बल्य, मेध्य, सत्ववर्धक है।
¬ योगेश्वर रस १ गोली, रौप्य वटी १ गोली, अर्शोघ्नी वटी, योगराज गुग्गुल १ गोली और इन्दुम् वटी पीसकर १*२ ।
¬ अभयारिष्ट १५ मि.ली. और वरुणसहचराभया कषाय १० मि.ली. तथा गोमूत्रासव १० मि.ली. मिलाकर समभाग जल से दिन में २ बार।
¬ मानव बाल और विजयापाउडर को आग में डालकर मस्सों में धूपन का निर्देश।
            वस्तुत: गोघृत ऐसी दिव्य औषधि और पोषण है जिसे भगवान् ने धरती के मानव आरोग्य के लिए दे रखा है यह स्नेहात् वातं शमयति, शैत्यात् पित्तं नियच्छति। घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत् कफम्।। च.चि. १/४०।। अर्थात् दिए गये घृत ने अपने स्नेहगुण से वात का शमन किया, शैत्यगण से पित्त का, (तिक्त द्रव्य) भल्लातक, कुटकी, गुग्गुल आदि से सिद्ध होने के कारण इसने कफ का शमन किया। तो वह रोगी के रस, शुक्र, ओज का हित करने लगा, उधर स्वर, वर्ण को ठीक करने लगा, जो गुदमार्ग में दाह था उसे अपने निर्वापणगुण से शमन करने लगा।
            भारत के महान् चिकित्सा आचार्य चरक ने गोघृत में ये गुण खोजकर भारत को पाँच हजार वर्ष पूर्व सौंप दिये हैं पढ़ें उन्हीं के शब्दों में-

घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रोजसां हितम्।
निर्वापणं मृदुकरं स्वरवर्ण प्रसादनम्।।
च.सू. १३/१४
            आचार्य एक और वैज्ञानिक रूप से अर्श एक विशिष्ट चिकित्सा सिद्धान्त घोषित करते हैं जो हमेशा स्मरणीय है-

यद्वायोनुलोम्याय यदाग्निबलवृद्धये।
अन्नपानौषधद्रव्यं तत् सेव्यं नित्यमर्शसै:।।
च.चि. १४/२४७
            अर्थात् जो खान-पान और औषध वायु को अनुलोमन कर सके, जो जठराग्नि बल को बढ़ सके, अर्श रोगी उसी को रोज अपनाये। उधर गो घृत का ही एक विशेष गुण है ‘‘स्मृतिबुद्धयाग्निशुक्रौज:।।’’ च.सू. २७/२३०।। स्मृति, बुद्धि, अग्नि और ओज को बढ़ाना, जो इस रोगी में विशेष गड़बड़ हो गया अंग्रेजी चिकित्सा कराते-कराते।
            जाठराग्नि के ठीक होने से शरीर की अन्य अग्नियाँ स्वत: ठीक होती जाती हैं। क्योंकि अग्नि के संतुलन से वात का स्वभाविक रूप से शमन और दर्द समाप्त। १० घण्टे में ही रोगी के गुदा की सूजन और असहनीय वेदना, रक्तस्राव, बेचैनी, घबराहट, अशांति, अनिद्रा मिट गयी और वह परिणाम मिला जो अंग्रेजी अस्पताल नहीं दे पाये। यह है आयुर्वेद।
अन्नस्यपक्तासर्वेषां पत्क्रणामधिपो मत:।। च.चि. १५/३९।।


            ठीक ७वें दिन रोगी बहुत ही खुशी-खुशी आया और अपना स्टेटमेण्ट इस प्रकार दिया।
            मुझे एक माह से टट्टी के रास्ते खून बहुत आता था और बेतहाशा दर्द रहता था। टट्टी की जगह पर मस्सा भी था। खून जाने से बहुत कमजोरी आ गयी थी। मैंने अंग्रेजी डॉक्टर को दिखाया उन्होंने खूब एण्टीबायोटिक व पेन किलर दिये, पर १ माह तक में न तो दर्द घटा न खून। बल्कि खून अधिक आने लगा, कमजोरी, बेचैनी, निराशा बढ़ने लगी।


            तभी मुझे एक वकील साहब गौतम जी जो पापा के मित्र हैं ने आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालय, चित्रकूटधाम के बारे में बताया। मैं दूसरे दिन ही आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालय, चित्रकूटधाम पहुँचा वहाँ रजिस्ट्रेशन करवाया और फिर मुझे ओपीडी-२ में डॉ. वाजपेयी जी के पास पहुँचा उन्हें सारी समस्यायें बतायीं उन्होंने २४ घण्टे में दर्द और खून आने में आराम कर दिया। बिना अंग्रेजी दवा, केमिकल केवल आयुर्वेद से।
            अब मुझे एहसास हुआ कि प्राचीन काल से तो हमारे देश के मानव के लिए आयुर्वेद ही था। एलोपैथ को आये केवल २०० साल ही तो हुये। यदि पहले ही आ जाता तो एक माह तक कष्ट न भोगता।
विनय सिंह भदौरिया
पुत्र
श्री भारत सिंह भदौरिया, एडवोकेट
रीवा रोड चाकघाट, रीवा (म.प्र.)

प्रभु श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूटधाम में स्थापित आयुष ग्राम ट्रस्ट आयुष ग्राम चिकित्सालय में ऐसे विशालदुर्लभप्रभावकारी औषधियोंचिकित्सा संसाधन की उपलब्धता की गयी ताकि पीड़ित मानव का कल्याण हो सके वह नर्सिंग होम की मँहगी चिकित्सा और ऑपरेशन से बच सकें । आप सभी आयें और लाभान्वित हों।
डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी
डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी एक प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। शास्त्रीय चिकित्सा के पीयूष पाणि चिकित्सक और हार्ट, किडनी, शिरोरोग (त्रिमर्म), रीढ़ की चिकित्सा के महान आचार्य जो विगड़े से विगड़े हार्ट, रीढ़, किडनी, शिरोरोगों को शास्त्रीय चिकित्सा से सम्हाल लेते हैं । आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम, दिव्य चिकित्सा भवन, आयुष ग्राम मासिक, चिकित्सा पल्लव और अनेकों संस्थाओं के संस्थापक ।

इनके शिष्यों, छात्र, छात्राओं की लम्बी सूची है । आपकी चिकित्सा व्यवस्था को देश के आयुष चिकित्सक अनुसरण करते हैं ।
डॉ. अर्चना वाजपेयी

डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (मेडिसिन आयु.) में हैं आप स्त्री – पुरुषों के जीर्ण, जटिल रोगों की चिकित्सा में विशेष कुशल हैं । मृदुभाषी, रोगी के प्रति करुणा रखकर चिकित्सा करना उनकी विशिष्ट शैली है । लेखन, अध्ययन, व्याख्यान, उनकी हॉबी है । आयुर्वेद संहिता ग्रंथों में उनकी विशेष रूचि है ।


सरकार आयुष को बढ़ाये मानव का जीवन बचाये!!
     सरकार को फिर से भारत में अंग्रेजी अस्पताल और अंग्रेजी मेडिकल कॉलेजों की जगह अच्छे और समृद्ध आयुष संस्थान खोलने चाहिए तथा उनसे पूरी क्षमता से कार्य लेना चाहिए। इससे भारत का मानव हार्ट के ऑपरेशनछेड़छाड़ स्टेंट और डायलिसिस जैसी स्थितियों से बचकर और हार्ट को स्वस्थ रख सकेगा। क्योंकि हार्ट के रोगी पहले भी होते थे आज भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिनका सर्वोच्च समाधान आयुष में है। आयुष ग्राम चित्रकूट एक ऐसा आयुष संस्थान है जहाँ ऐसे-ऐसे रस-रसायनों/ औषध कल्पों का निर्माण और संयोजन करके रखा गया है जो जीवनदान देते हैं। पंचकर्म की व्यवस्था एम.डी. डॉक्टरों के निर्देशन में हो रही हैपेयाविलेपीयवागू आदि आहार कल्पों की भी पूरी उपलब्धता है इसलिये यहाँ के ऐसे चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
   
आयुष ग्राम चिकित्सालय:चित्रकूट 
   मोब.न. 9919527646, 8601209999
 website: www.ayushgram.org



  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी         आयुर्वेदाचार्यपी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.) एन.डी.साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि (आयुर्वेद)एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत), एल-एल.बी. (B.U.)
 प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव और आयुष ग्राम मासिक
पूर्व उपा. भारतीय चिकित्सा परिषद
उत्तर प्रदेश शासन 
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                              एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ परमानन्द वाजपेयी                                                                   आयुर्वेदाचार्य



डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 


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