सही निदान तो चिकित्सा परिणाम भी अद्भुत : ब्लड प्रेशर, चर्मरोग से ग्रस्त एक रोगिणी में चिकित्साऽनुभव


डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी 
Evidence based treatment (वैज्ञानिक प्रमाण युक्त चिकित्सा)

वृद्धिस्थानक्षयावस्थां दोषाणामुपलक्षयेत्।
सुसूक्ष्मापि च प्राज्ञो देहाग्निबलचेतसाम्।
व्याध्यावस्थाविशेषान् हि ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षण:।
तस्यां तस्यामवस्थायां चतु:श्रेय: प्रपद्यते।।
च.नि. ८/३६-३७।।
                दुनिया के महान् चिकित्सा दार्शनिक और वैज्ञानिक भगवान् पुनर्वसु आत्रेय एक सूत्र देते हैं कि चिकित्सक के पास जब रोगी आये तो अच्छे ढंग से रोग का निदान (Diagnosis) करें, रोग उत्पन्न करने वाले दोषों की वृद्धि, अपने स्थान की समस्थिति तथा क्षय इन तीनों अवस्थाओं का ज्ञान करे, रोगी के शरीर उसकी जठराग्नि और उसके मन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म दशा का ज्ञान करे। ऋषि आगे लिखते हैं कि चिकित्सक रोग की विभिन्न अवस्थाओं को जानें तदनुसार चिकित्सा करें।
            यह स्थिति प्रारम्भ में तो कठिन लगती है पर गुरु सानिध्य में अभ्यास करते रहने फिर स्वतंत्र रूप से अभ्यास करते रहने से ऐसा मजेदार अभ्यास हो जाता है कि चिकित्सक चुटकी बजाते ही रोगी के सही निदान में पहुँच ही जाता है। पर आज जिस प्रकार वैज्ञानिक चिकित्सा के नाम पर अन्धाधुन्ध अंग्रेजी चिकित्सा छाई जा रही है उससे रोग और रोगी दोनों बर्बाद हो रहे हैं यदि कोई बचकर निकल भी जाय तो वह सौभाग्यशाली है। ऐसा ही एक प्रकरण यहाँ पर उल्लेखनीय है।
            १० नवम्बर २०१९ को आयुष्मा के पूर्व महासचिव डॉ. अशोक श्रीवास्तव जी, लाला का बाजार, ग्वालियर से एक सेवानिवृत्त वन क्लास अधिकारी को उनकी श्रीमती गंगा अग्रवाल उम्र ६७ वर्ष को लेकर आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चित्रकूटधाम में आये। रजिस्ट्रेशन हुआ फिर अपना क्रम आने पर ओपीडी में आये। उन्होंने अपनी केस हिस्ट्री बतायी कि ४ साल पहले हाई ब्लडप्रेशर हुआ जिसे ग्वालियर के एक अंग्रेजी डॉक्टर को दिखाया, उन्होंने दवायें चलायीं।
            दवा खाती रहीं तो कुछ दिनों बाद, घबराहट, बेचैनी, नींद न आना, काम करने का उत्साह न होना आदि समस्यायें शुरू हो गयीं।
            तो उन्हें फिर अंग्रेजी अस्पताल में दिखाया तो अब उन्हें थायराइड की बीमारी बतायी और दवायें शुरू कर दिया।
            डेढ़ साल बाद दोनों पैरों के तलवे कटने लगे उसके लिए फिर अंग्रेजी चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया तो उन्होंने क्रेक और सोरायसिस बताया और दवा शुरू कर दी, इसकी भी दवा खाती रही।
            कुछ दिन बाद हाथ की हथेलियाँ फटने लगीं। डॉक्टर के पास गये उन्होंने दवा बढ़ा दी।
            अब इधर १ माह से पैरों और हाथों में तिल जैसे सफेद दाग होने लगे। फिर वे चर्मरोग विशेषज्ञ के पास गये तो उन्होंने फिर दवा बढ़ा दी।
            इस प्रकार वे रोग से परेशान जो थे वह सबसे अधिक परेशान हो गये दवाओं और केमिकल से। सोचने लगे कि क्या होगा?
            तभी उनकी भेंट आयुष्मा के पूर्व महासचिव और म.प्र. शासन के सेवानिवृत्त वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. अशोक श्रीवास्तव जी से भेंट हुयी उन्होंने आयुष ग्राम चित्रकूटधाम की सलाह दी कि यहाँ आपका सही निदान और सही चिकित्सा हो सकेगी, जिससे धीरे-धीरे दवाइयाँ घटेंगी पर रोज-रोज बढ़ेंगी तो नहीं और रोग भी घटेगा तथा नये-नये रोग पैदा नहीं होंगे।
            श्रीमती गंगा अग्रवाल (रोगिणी) का जब आयुर्वेदीय ढंग से परीक्षण प्रारम्भ किया गया तो पाया गया कि रोगिणी के रोग की जड़ तो उसकी मानस विकृति थी और डॉक्टर कर रहे थे शारीरिक लक्षणों की चिकित्सा, ऐसे में तो न तो दवाइयों का सिलसिला रुकेगा और रोग बढ़ते ही जायेंगे न।
            केस हिस्ट्री के दौरान यह बात उभरकर आयी कि ५ साल पहले कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं जिससे श्रीमती गङ्गा अग्रवाल में मानसिक क्षोभ से लम्बे समय तक गुजरना पड़ा।

आचार्य चरक के वचन हैं-

मनोबुद्धिसंज्ञाज्ञानस्मृति भक्तिशीलचेष्टाचार विभ्रमं उन्मादं विद्यात्।।
च.चि. ७/५।।

                अर्थात् मनोविभ्रम, बुद्धिविभ्रम, संज्ञाविभ्रम, ज्ञानविभ्रम, स्मृतिविभ्रम, भक्तिविभ्रम, शीलविभ्रम, चेष्टाविभ्रम और आचार विभ्रम ये ऐसे मानसिक भाव हैं जो दोषों को ऊर्ध्वगामी करके हृदय और मस्तिष्क की स्थिति को अस्वाभाविक बना देते हैं परिणामत: शरीरगत भाव विकृत होने लगते हैं।
            आगे आचार्य चरक इस प्रकरण में विज्ञान सम्मत विचार (च.चि. ७/६ में) देते हैं कि इस व्याधि का रूप आने के पहले शिर की शून्यता, आँखों में बेचैनी, श्वास का वेगवती होना, भोजन की अनिच्छा, अरोचक, अपचय, हृदय में जकड़ाहट, बिना प्रसंग के ध्यान भटक जाना, बिना मेहनत के थकावट, बार-बार रोमांच, लगातार ज्वर, शरीर में चकत्ते (चर्मरोग), विचित्र प्रकार की मुखाकृति बनना ऐसे लक्षण आते हैं। (च.चि. ७/६)

            इस प्रकार रोग का सही कारण ढूँढने से श्रीमती गंगा जी के रोग की सम्प्राप्ति ऐसी निर्मित हुयी-

            मन:क्षोभ (मनोविभ्रम, बुद्धिविभ्रम, चेष्टाविभ्रम और आचार विभ्रम) मानव प्रकृतियों की अस्त व्यस्तता ➡️ मानसिक दोष रज-तम और शारीरिक दोष वात, पित्त कफ का उन्मार्ग ➡️ प्रकुपित दोषों से हृदय/मस्तिष्क दोष ➡️ इस प्रकार सम्प्राप्ति संघटन में जो व्याधि लक्षण उत्पन्न हुये शिर की शून्यता, बेचैनी, श्वास का वेगवान होना ..........................................................शरीर में चकत्ते (चर्म रोग) विचित्र प्रकार की मुखाकृति बनना आदि।

            जब इतने लक्षण आयेंगे और हम अंग्रेजी चिकित्सा में जायेंगे तो वह ब्लडप्रेशर नापेगा ही। किन्तु यह भी सही है कि शरीर का रक्तचाप अस्त-व्यस्त होगा ही ऐसे में रक्तचाप बढ़ना कोई रोग तो नहीं हो गया वह तो केवल व्याधि का एक उपलक्षण हुआ। पर अंग्रेजी डॉक्टर तो केवल ब्लड प्रेशर तक ही सोचेगा, यहीं तक उसे सोचना, पढ़ना और काम करना सिखाया जाता है और हम भारतीय उसी में उलझ जाते हैं।

            पर अंग्रेजी डॉक्टरों ने रक्तचाप बढ़ा देखा, डरवाया और बस ठोंकना शुरू किया केमिकल। जिसके आगामी दुष्परिणाम चाहें कुछ भी हों।

            आयुष ग्राम चित्रकूट में रोगी के आने पर हमने चरकीय वचन आधारित प्रकार से रोगी का सम्पूर्ण अध्ययन किया पूर्व की जाँच रिपोर्टें देखी गयीं फिर सबसे पहले निम्नांकित आहार क्रम और चिकित्सा व्यवस्था पत्र विहित किया गया।

आहार- पुराना चावल (माड़ निकाला), पुराना गेंहूँ, जौ, मूँग की दाल, नवीन पुराण, गोघृत, शु. जल, परवल, लौकी, चौलाई, बथुआ, भिण्डी, किशमिश, शतधौत लगाने और खाने में।

अपथ्य- विरुद्ध आहार, भैंस का दुग्ध, चाय सेवन, उष्ण पेय (चाय-कॉफी), सरसों का तेल, उष्ण, तीक्ष्ण, विदाही आहार, कुन्दुरू, करेला, गर्म मसाला, अचार आदि।

            आहार पर प्रथम इसलिए ध्यान दिया गया कि भगवान् धन्वन्तरि उन्माद में पहला कारण विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि ... बताते हैं। आचार्य चरक युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा में ‘‘पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना।। च.सू. ११/५४।।’’ लिखकर यह बताते हैं कि देश, दोष, काल, वय आदि का विचार कर आहार तथा औषधि की उचित योजना करनी चाहिए।

औषध-
१. पटोलमूल, हरीतकी, विभीतकी, आमलकी, इन्द्रायण, त्रायमाण, कुटकी, सोंठ का क्वाथ १५-१५ मि.ली. भोजन के ४५ मिनट पूर्व।
२. श्रेष्ठ जवाहरमोहरा (स्वर्णयुक्त और गुलाब जल की २१ भावना युक्त) ३० गोली, प्रवाल भस्म, स्वर्ण भस्म ५० मि.ग्रा. रौप्य भस्म २ ग्राम, कैशोर गुग्गुल १५ ग्राम, शु. हरताल ३ ग्राम, मुक्तापिष्टी २ ग्राम और ब्राह्मी चूर्ण सभी घोंटकर ६० मात्रा। १*२ मधु के अनुपान से।
३. शतधौतघृतम् ३-३ ग्राम सुबह-शाम चाटना और लगाना भी है।

            १ माह बाद जब वे पुन: दिखाने आये तो बताया कि बहुत आराम है। बेचैनी, हृदय में जकड़ाहट, लगातार ज्वर जैसे लक्षण तो ५० प्रतिशत मिट गये। अंग्रेजी दवा खाते हुये जो ब्लडप्रेशर १५०/१०० रहता था वह घटकर १३०/९० हो गया जबकि हमने सर्पगन्धा, जटामांसी, वचा, रुद्राक्ष आदि कोई भी रक्तभार शामक औषधि नहीं प्रयोग की।
            जंगली पटोलमूल, त्रिफला, कटुकी का यह क्वाथ एक ऐसा संतुलित औषध कल्प है जो उचित मात्रा में देने से तीनों दोषों को स्वस्थानस्थ कर देता है। पटोलमूल जहाँ सुख विरेचन है वहाँ विरेचन कर्म के माध्यम से वातानुलोमन और पित्तनिर्हरण का कार्य सम्पन्न करती है।
            पटोलस्यभवेन्मूलंविरेचनकरं सुखात्।।(भा.प्र.)

            रजोदोष के कारण वात और कामकी वृद्धि तथा कामसे क्रोध यानी मन:क्षोभ का कार्य होता है। यह तभी होता है जब पित्त दूषित हो जायेगा। क्योंकि निर्दोष पित्त के आधार पर ही सतोगुण और मेधाकी स्थिति सम्यक् रहती है। यदि तमो दोष बढ़ेगा तो शरीर में प्रमाद (व्यर्थ की चेष्टायें) आलस्य और निद्रा की स्थिति बन ही जाती है, किन्तु पटोल मूल कफ दोष विनाशक भी है- मूलं कफविनाशनम्।। (नि.र.) जब कफ दोष का शमन होगा तो तमोदोष स्वत: मिट जायेगा। क्योंकि ये दोनों समवाय सम्बन्ध रखते हैं।

            पटोलमूल के साथ कुटकी संज्ञास्थापनका कार्य विशेष रूप से करने लगती है क्योंकि कुटकी अपने आप में संज्ञास्थापन द्रव्य है। (च.सू. ४/१८ (४८)। चरक चिकित्सा १०.१४, १०.५२ सूत्र से यह सिद्ध होता है कि जब तमोदोष से मन और बुद्धि ढक जाती है तो संज्ञानाश होता है इसके आवरण को नष्ट कर देने से व्यक्ति की संज्ञा स्थापित हो जाती है और स्मृति ठीक हो जाती है।

            जब भी मनो विभ्रम आदि होंगे तो हृदय प्रभावित होता ही है क्योंकि सिद्धान्त है कि-

षडंगमंगं विज्ञानमिन्द्रियाण्यार्थ पंचकम्।
आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदिसंस्थितम्।।
(च.सू. ३०/४)
            पटोलमूल, त्रिफला, कुटकी युक्त क्वाथ में हरीतकी की युक्ति योजना भी बहुत ही वैज्ञानिक और युक्ति पूर्वक है जो स्मृति, बुद्धिप्रमोह को दूर करती है इन्द्रियों को चैतन्य और प्रसन्न करती है। इसके विषय में शास्त्र वचन है-

स्मृतिबुद्धि प्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी।। च.चि. १/३४
वातानुलोमनी हृद्या सेन्द्रियाणां प्रसादिनी।। ध.नि.।।

            इस क्वाथ में त्रायमाण एक ऐसा द्रव्य है जो ज्वरघ्न है और हृद्य भी है, इसलिए यह इन्द्रिय और मानसिक संताप का निवारण करता है क्योंकि- देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली।। च.चि. १/४।। यानी ज्वर देह के साथ इन्द्रिय और मन को भी संतप्त करता है और ज्वरघ्न द्रव्य देह के साथ इन्द्रिय और मन को भी स्वस्थ करते हैं। (रोगिणी को ज्वर की अनुभूति होती रहती ही थी) यही कारण है त्रायमाण को कुटकी के प्रतिनिधि के रूप में भी व्यवहार करते हैं।

            इस वैज्ञानिकता के कारण भी त्रायमाण कुटकी की तरह संज्ञास्थापन करता है। अन्तर इतना है कि कुटकी पहले हृदय पर कार्य कर फिर इन्द्रिय और पाचन स्थान पर कार्य करती है। किन्तु त्रायमाण इन्द्रिय, पाचन संस्थान पर कार्य कर पश्चात् हृदय पर भी कार्य करता है। कुटकी रोचन और दीपन किन्तु त्रायमाण अपने उष्णवीर्य से आम पाचन भी है और अग्निमांद्य नाशक है।

            इस प्रकार पटोलमूलत्रिफलाकटुकी क्वाथ ने रोग सम्प्राप्ति विघटन किया, मनोविभ्रम को दूर कर दोषों को प्रकृतिस्थ कर, हृदय और मस्तिष्क को दोषमुक्त कर। परिणामत: शिर की शून्यता, बेचैनी, श्वास का वेगवान् होने, त्वक् विकृति आदि विकारों से मुक्ति होने लगी। रक्तचाप सामान्य होने लगा।

            रोगी वृद्धावस्था का था और वृद्धावस्था के कारण धातुक्षय, धमनी, सिराओं की दुर्बलता के निवारण के लिए श्रेष्ठ जवाहरमोहरा आदि का योग (नं.२) दिया गया इससे धातुक्षय दूर हुआ, तर्पक कफ का निर्माण होने लगा तो साधक पित्त की स्थिति सही बनने लगी। वातानुलोमन और शमन होने लगा, त्वक् विकृति मिट गयी। क्योंकि वाग्भट्ट लिखते हैं कि ‘‘त्वचि स्फुटन रुक्षते।।’’ यानी त्वचा को फटने (क्रेक) में वातदोष की भूमिका होती है।

            इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि यदि सही निदान है तो चिकित्सा परिणाम भी अद्भुत मिलते ही हैं।



डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी
डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी एक प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। शास्त्रीय चिकित्सा के पीयूष पाणि चिकित्सक और हार्ट, किडनी, शिरोरोग (त्रिमर्म), रीढ़ की चिकित्सा के महान आचार्य जो विगड़े से विगड़े हार्ट, रीढ़, किडनी, शिरोरोगों को शास्त्रीय चिकित्सा से सम्हाल लेते हैं । आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम, दिव्य चिकित्सा भवन, आयुष ग्राम मासिक, चिकित्सा पल्लव और अनेकों संस्थाओं के संस्थापक ।

इनके शिष्यों, छात्र, छात्राओं की लम्बी सूची है । आपकी चिकित्सा व्यवस्था को देश के आयुष चिकित्सक अनुशरण करते हैं ।
डॉ. अर्चना वाजपेयी

डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (मेडिसिन आयु.) में हैं आप स्त्री – पुरुषों के जीर्ण, जटिल रोगों की चिकित्सा में विशेष कुशल हैं । मृदुभाषी, रोगी के प्रति करुणा रखकर चिकित्सा करना उनकी विशिष्ट शैली है । लेखन, अध्ययन, व्याख्यान, उनकी हॉबी है । आयुर्वेद संहिता ग्रंथों में उनकी विशेष रूचि है ।
सरकार आयुष को बढ़ाये मानव का जीवन बचाये!!
     सरकार को फिर से भारत में अंग्रेजी अस्पताल और अंग्रेजी मेडिकल कॉलेजों की जगह अच्छे और समृद्ध आयुष संस्थान खोलने चाहिए तथा उनसे पूरी क्षमता से कार्य लेना चाहिए। इससे भारत का मानव हार्ट के ऑपरेशनछेड़छाड़ स्टेंट और डायलिसिस जैसी स्थितियों से बचकर और हार्ट को स्वस्थ रख सकेगा। क्योंकि हार्ट के रोगी पहले भी होते थे आज भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिनका सर्वोच्च समाधान आयुष में है। आयुष ग्राम चित्रकूट एक ऐसा आयुष संस्थान है जहाँ ऐसे-ऐसे रस-रसायनों/ औषध कल्पों का निर्माण और संयोजन करके रखा गया है जो जीवनदान देते हैं। पंचकर्म की व्यवस्था एम.डी. डॉक्टरों के निर्देशन में हो रही हैपेयाविलेपीयवागू आदि आहार कल्पों की भी पूरी उपलब्धता है इसलिये यहाँ के ऐसे चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
   
आयुष ग्राम चिकित्सालय:चित्रकूट 
   मोब.न. 9919527646, 8601209999
 website: www.ayushgram.org



  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी         आयुर्वेदाचार्यपी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.) एन.डी.साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि (आयुर्वेद)एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत), एल-एल.बी. (B.U.)
 प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव और आयुष ग्राम मासिक
पूर्व उपा. भारतीय चिकित्सा परिषद
उत्तर प्रदेश शासन 
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                              एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ परमानन्द वाजपेयी                                                                   आयुर्वेदाचार्य



डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 


Post a Comment

0 Comments