दिन में १०० - १०० झटके आने वाली महिला की सफल चिकित्सा !!


ध्यातव्य 
आयुर्वेद में 'बाल चिकित्सा' बहुत ही प्रभावशाली और जीवनदायिनी है यदि आयुर्वेद की ‘बाल चिकित्सा’ समृद्ध हो जाय तो देश की बहुत आबादी निरोग हो जाय। क्योंकि बच्चों में की जाने वाली आयुर्वेदिक चिकित्सा, बच्चे को जीवन भर मानसिक और शारीरिक रूप से पुष्ट करती है तथा बच्चों की की गयी एलोपैथिक चिकित्सा जीवन भर के लिए बच्चे को मानसिक, शारीरिक रूप से कमजोर कर देती है अतः हम पुनः उन जागृत आत्माओं का आवाहन करते हैं कि यदि आप वास्तव में लोक कल्याण की बात सोचते हैं तो लोगों को बच्चों को आयुर्वेदीय चिकित्सा के लिए प्रेरित करें, और जन - जन में प्रसारित करें 

  डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी
संस्थाध्यक्षआयुष ग्राम (ट्रस्ट) चित्रकूटधाम (उ.प्र.) २१०२०५

                ‘‘एलोपैथिक गोलियाँ खाते-खाते रोग तो गया नहीं उल्टे मेरी स्थिति यह हो गयी थी कि भोजन करते समय हाथ में कौर उठाकर जब मैं मुँह में ले जाती थी तो मेरा हाथ बायें कान की ओर चला जाता था, सुबह जब घर में दूध दुह कर आता था जब मैं बाल्टी से दूध को भगौने में उड़ेलती थी तो उसकी धार जमीन में गिरने लगती थी।’’



            यदि मानसिक रोगों से पीड़ित स्त्री-पुरुषों की चिकित्सा शुरूआत से ही आयुर्वेद से करायी जाय तो लाखों मनोरोगियों को फिर से नया जीवन दिया जा सकता है। आज हजारों मानसिक व्याधिग्रस्त व्यक्ति एलोपैथिक इलाज के कारण जिन्दा लाश बनकर जी रहे हैं। हम एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ दून कॉलेजमें पढ़ता था, वहीं से उसे अपस्मार’ (मिरगी) के झटके आना शुरू हुए। एलोपैथिक दवाइयाँ चलीं, जब तक दवाइयाँ खाता तो दौरे नहीं आते जैसे ही दवाइयाँ बन्द करता तो झटके फिर आने लगते।
            एलोपैथिक दवा खाते-खाते वह दिमागी रूप से इतना दुर्बल हो गया कि उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी और उसे आज वृद्धावस्था में भी उसे उन्हीं दवाइयों के सहारे जीवन बिताना पड़ रहा है।
            ऐसे ही अक्टूबर २०१४ की बात चित्रकूट जिले की प्रेमा पटेल नाम की एक महिला को उसके एक रिश्तेदार दिव्य चिकित्सा भवन लेकर आये। महिला की उम्र ३० वर्ष थी पर वह ४० वर्ष के आस-पास लगती थी। पूरा शरीर का रंग काला था। उस समय उसे देखकर यही लगता था कि कोई सड़क, मकान बनने में मजदूरी का काम करने वाली महिला है।



            डॉ. अर्चना वाजपेयी ने केस हिस्ट्री ली, तो रोगिणी ने बताया कि २ साल पहले उसे अचानक एक दिन झटके (आक्षेप) आना शुरू हो गये। मेरा आदमी गाँव के ही एक झोलाछाप डॉक्टर को ले आया, उसने इंजेक्शन दिया और कुछ गोलियाँ भी, उससे नींद आ गयी। जब नींद खुली तो शरीर में दर्द, आलस्य था। तीसरे दिन भी रोग का दौरा आ गया, तब मुझे लेकर जानकीकुण्ड चिकित्सालय ले गये। संयोग ऐसा था उस दिन इस चिकित्सालय में इलाहाबाद के एक बहुत बड़े दिमाग के डॉक्टर कहे जाने वाले डॉक्टर का कैम्प था। उन्होंने दवाइयाँ लिखीं और कुछ जाँचों हेतु इलाहाबाद बुलाया। हम लोग इलाहाबाद गये तो उन्होंने ये जाँचें करायीं (इतना कहते-कहते उस महिला में कई जाँच रिपोर्टें रख दीं, ये जाँचें ई.ई.जी. और सी.टी. स्कैन थीं।)
            इसके बाद ये दवाइयाँ लिख दीं। (महिला ने दवाइयों का पैकेट भी सामने रख दिया।) उनमें से गैरोइन, कोलेन्जेप, एलप्राजोलम, फोलिक एसिड थी, एक स्ट्रिप टेगरीटाल की भी उसमें पड़ी थी। किन्तु दवा खाते-खाते २ साल हो गये पर मुझे दिन भर में सौ-सौ झटके बायीं ओर (जिसमें कान, आँख, कन्धा और ग्रीवा प्रभावित हैं) आ जाते हैं, दाँतों की किटकिटाहट होती है। यह कहते-कहते उसने दिखाया कि देखिए सर! ऐसे झटके आते हैं।
            अब मैं इन दवाओं से परेशान हो गयी हूँ तभी इस आयुर्वेद संस्थान के बारे में पता चला। एक लड़की जो यहाँ से ठीक हो चुकी है उसी ने यहाँ के बारे में बताया है।
            चूँकि डॉ. अर्चना वाजपेयी मेरे सामने ही केस हिस्ट्री ले रही थीं, उसे हम सुन रहे थे।
            डॉ. अर्चना वाजपेयी जी ने रोगिणी का दशविध परीक्षण किया तो उसकी प्रकृति-वातज, पित्तज विकृति- रस और मन सार-हीनसार वय-युवा अग्नि-विषम सात्म्य-कट्वम्ल पुरीष-निराम निद्रा- विषम सत्व-अवर था।
            हमने पूछा कि आपको यह बीमारी शुरू होने से पूर्व याद है कि कोई शोक, सदमा, चिन्ता, तनाव जैसी घटनायें हुयीं थीं। उसने कहा नहीं, फिर उसने कुछ ध्यान करते हुए बताया कि मैं लम्बे समय से चिन्ता करती आ रही हूँ कि कहीं जेल न चली जाऊँ। मैंने पूछा कि ऐसा क्या हो गया कि आपको जेल का भय सता रहा था, उसने कहा सर! भय नहीं सता रहा था बल्कि दिमाग से यह भय उतरता ही नहीं था, बाद में यह झटकों की बीमारी हो गयी तो उधर ध्यान कम जाता है।

            हमने फिर दोहराया कि जेल का भय क्यों सता रहा है? उसने कहा यह न बता पाऊँगी। हमने दर्शन, स्पर्श और प्रश्नादि के बाद प्रेमा नामक इस रोगिणी का वातज अपस्मारनिदान किया। क्योंकि जिस लक्षण को वह झटका कह रही थी वह झटका नहीं वह कम्पन था। वातज अपस्मार के लक्षण भगवान पुनर्वसु आत्रेयने इस प्रकार बताये हैं।
कम्पते प्रदेशदन्तान् फेनद्वामी श्वसित्यपि।
परुषारुणकृष्णानि पश्येद् रूपाणि चानिलात्।।
च.चि.१०/९
             शरीर में कम्पन होता है  रोगी दाँतों को किटकिटाता है  मुख से झाग निकल सकता है  श्वास गति तीव्र हो जाती है  रोगी प्रत्येक वस्तु को रुक्ष, अरुण और कृष्ण वर्ण देखता है।
            दरअसल इस महिला के झटके देखकर आक्षेपक रोग (Convulsions) का भ्रम हो सकता था। पर ध्यान रखने की बात है कि आक्षेपक (झटके) रोग में मनोविभ्रम नहीं होता, श्वासगति तीव्र नहीं होती और दाँतों की किटकिटाहट नहीं होती। चिकित्सक द्वारा यह निदान ही तो महत्वपूर्ण है यदि निदान सही होगा तो औषध चयन ठीक होगा।
            हमने श्रीमती प्रेमा को आश्वासन दिया कि आप चिन्ता न करें, बहुत जल्दी ठीक होंगी और अच्छी तरह ठीक होंगी।
            इस रोग की सटीक सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हुयी -
            चिन्ता भयादि भावों का निरन्तर सेवन ➡️ शारीरिक दोष वात एवं रज तम का प्रकोप ➡️ मनोवह स्रोतस दुष्टि ➡️ हृदय प्रदेश में दोष दूष्य सम्मूच्र्छना ➡️ मनः क्षोभ ➡️ स्मृति भृंश ➡️ कम्पन, दन्तकिटकिटाना ➡️ वातज अपस्मार।
            यद्यपि कुछ विद्वानों का मत यह भी है सम्प्राप्ति में रोग का भेद स्पष्ट नहीं किया जाता। क्योंकि सम्प्राप्ति की सीमा रोगोत्पत्ति को स्पष्ट करना है। किन्तु यहाँ पर हम वातज अपस्मार की सम्प्राप्ति निर्मित कर रहे हैं अतः यह प्रतिबन्ध यहाँ पर लागू नहीं होता।

            निदानोपरान्त हमने निम्नलिखित चिकित्सा व्यवस्था पत्र विहित की -

            . वातकुलान्तक रस १२५ मि.ग्रा., सर्पगन्धा चूर्ण ५०० मि.ग्रा., शंखपुष्पी वचा, ब्राह्मी और कूठ प्रत्येक का घनसत्व २५०-२५० मि.ग्रा., अकीक पिष्टी १२५ मि.ग्रा. सभी मिलाकर एक मात्रा। ऐसी १-१ मात्रा सुबह-शाम शहद से।
            २. अमर सुन्दरी वटी ५०० मि.ग्रा., केशर चूर्ण १२५ मि.ग्रा. मिलाकर दोपहर व रात में शहद से।
            ३. विजयपुष्पाद्यावलेह २ ग्राम रात में सोते समय दूध से।
            ४. भोजनोपरान्त - पथ्यादि क्वाथ ३० मि.लि. त्रिफलादि क्वाथ ३० मि.लि. मिलाकर दिन में २ बार।
            ५. कपाल भाति प्राणायाम ३० मिनट, अनुलोम-विलोम प्राणायाम १० मिनट तक।
            ६. गोघृत ४-४ बूँद का प्रतिदिन नस्य।
            ७. भोजन में २०-२० ग्राम गोघृत दिन में २ बार अवश्य लें।
            ८. अपथ्य- दही, सलाद, पत्तेदार शाक, मिर्च, मसाला, चटपटी चीजें, दही, बैगन, पूड़ी, पराठा।
            ९. चिन्ता, शोक, तनाव, भय, क्रोध से दूर रहने की सलाह।



                        श्री गोविन्द दास (कर्ता भै.र.) ने अपस्मार में निम्नांकित अपथ्य बताये हैं -
चिन्तां शोकं भयं क्रोधमशुचीन्यशनानि च।
मद्यं मत्स्यं विरुद्धान्नं तीक्ष्णोष्णगुरुभोजनम्।
अतिव्यवायमायासं पूज्यपूजाव्यतिक्रमम्।।
पत्रशाकानि सर्वाणि बिम्बीमाषाढकं फलम्।
तृषानिद्राक्षुधावेगमपस्मारी परित्यजेज्।।
तोयावगाहनं शैलद्रुमाध्यारोहणं तथा।
इत्यादीनि स्मृतिध्वंसे वर्जनीयानि यत्नतः।।

            यानी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, दूषित पदार्थों का भक्षण, मद्य, मत्स्य, प्रकृति आदि से विरोधी आहार, अत्यन्त तीक्ष्ण, गरम और गरिष्ठ भोजन, अधिक सम्भोग और अधिक व्यायाम, पूज्य पुरुषों का तिरस्कार, सभी प्रकार के पत्तेदार शाक, बिम्बी शाक, आषाढ़फल, भूख, प्यास और नींद इनके वेग को रोकना, जल में अवगाहन या तैरना, पर्वतों और वृक्षों के ऊपर चढ़ना ये सब अपस्मार में वर्जनीय है।
            एक माह बाद वह महिला चित्रकूट में आयुष ग्राम चिकित्सालय में दिखाने आयी तो वह बहुत ही खुश थी। उसने बताया कि डॉ. साहब! बहुत ही आराम मिला है। उसने हैरत में डालने वाली बात बतायी कि-
            ‘‘एलोपैथिक गोलियाँ खाते-खाते रोग तो गया नहीं उल्टे मेरी स्थिति यह हो गयी थी कि भोजन करते समय हाथ में कौर उठाकर जब मैं मुँह में ले जाती थी तो मेरा हाथ बायें कान की ओर चला जाता था, सुबह जब घर में दूध दुह कर आता था जब मैं बाल्टी से दूध को भगौने में उड़ेलती थी तो उसकी धार जमीन में गिरने लगती थी।’’
            उसने यह कहा कि डॉ. साहब! एक माह की आपकी चिकित्सा से मेरे शरीर की कालिमा ३० प्रतिशत हट चुकी है चेहरे में निखार आ गया है। अब मेरा भोजन लिए हाथ सीधे मुँह में जाता है। घर वाले मानने लगे थे कि कोई भूत-प्रेत का साया है क्या? अब घर वाले बहुत ही खुश हैं।
            उस महिला ने बताया कि वह जूनियर हाई स्कूल (राजकीय) में शिक्षिका है। तब हमें आश्चर्य हुआ कि जिसे हम मजदूर महिला समझते थे उसे तो एलोपैथिक दवाइयों ने इस दशा तक पहुँचा दिया था। यद्यपि बातचीत से तो पहली बार ही हमें लगा था कि यह महिला जो मजदूर लग रही है वह इतना अच्छा बोल कैसे लेती है।
            दरअसल-
            तत्र वातवृद्धौ वाक्यपारुष्यं काश्र्यं काष्णर्यं गात्रस्फुरणमुष्णकामिता निद्रानाशोऽल्पबलत्वं गाढवर्चस्त्वं च।।
सु.सू.१५/१४
            के अनुसार वाणी में कर्कशता, कृशता, कालापन, अंगों का फड़कना, गरम वस्तु की चाह, अनिद्रा, अल्पबल और पुरीष का गाढ़ापन ये सभी लक्षण उसके शरीर में वात की वृद्धि से ही तो थे।
            हमने उपर्युक्त चिकित्सा व्यवस्था लगातार ६ माह तक पथ्यापथ्यपूर्वक सेवन कराया और आज वह महिला पूरी तरह से रोग मुक्त है।
            पाठक बन्धु जरा चिन्तन करें कि यदि उस महिला को उचित आयुर्वेदिक चिकित्सा न मिलती तो उसकी क्या दशा होती? एलोपैथी तो धीरे-धीरे उसका नर्वस सिस्टम ही खराब कर रही थी।
            इसीलिए हम पाठकों से बार-बार निवेदन करते हैं कि कम से कम आप इतना तो कर ही सकते हैं कि पीड़ित रोगियों को सही मार्गदर्शन मिले।



डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी
डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी एक प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। शास्त्रीय चिकित्सा के पीयूष पाणि चिकित्सक और हार्ट, किडनी, शिरोरोग (त्रिमर्म), रीढ़ की चिकित्सा के महान आचार्य जो विगड़े से विगड़े हार्ट, रीढ़, किडनी, शिरोरोगों को शास्त्रीय चिकित्सा से सम्हाल लेते हैं । आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम, दिव्य चिकित्सा भवन, आयुष ग्राम मासिक, चिकित्सा पल्लव और अनेकों संस्थाओं के संस्थापक ।

इनके शिष्यों, छात्र, छात्राओं की लम्बी सूची है । आपकी चिकित्सा व्यवस्था को देश के आयुष चिकित्सक अनुशरण करते हैं ।

डॉ. अर्चना वाजपेयी

डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (मेडिसिन आयु.) में हैं आप स्त्री – पुरुषों के जीर्ण, जटिल रोगों की चिकित्सा में विशेष कुशल हैं । मृदुभाषी, रोगी के प्रति करुणा रखकर चिकित्सा करना उनकी विशिष्ट शैली है । लेखन, अध्ययन, व्याख्यान, उनकी हॉबी है । आयुर्वेद संहिता ग्रंथों में उनकी विशेष रूचि है ।


सरकार आयुष को बढ़ाये मानव का जीवन बचाये!!
     सरकार को फिर से भारत में अंग्रेजी अस्पताल और अंग्रेजी मेडिकल कॉलेजों की जगह अच्छे और समृद्ध आयुष संस्थान खोलने चाहिए तथा उनसे पूरी क्षमता से कार्य लेना चाहिए। इससे भारत का मानव हार्ट के ऑपरेशनछेड़छाड़ स्टेंट और डायलिसिस जैसी स्थितियों से बचकर और हार्ट को स्वस्थ रख सकेगा। क्योंकि हार्ट के रोगी पहले भी होते थे आज भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिनका सर्वोच्च समाधान आयुष में है। आयुष ग्राम चित्रकूट एक ऐसा आयुष संस्थान है जहाँ ऐसे-ऐसे रस-रसायनों/ औषध कल्पों का निर्माण और संयोजन करके रखा गया है जो जीवनदान देते हैं। पंचकर्म की व्यवस्था एम.डी. डॉक्टरों के निर्देशन में हो रही हैपेयाविलेपीयवागू आदि आहार कल्पों की भी पूरी उपलब्धता है इसलिये यहाँ के ऐसे चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
   
आयुष ग्राम चिकित्सालय:चित्रकूट 
   मोब.न. 9919527646, 8601209999
 website: www.ayushgram.org



  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी         आयुर्वेदाचार्यपी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.) एन.डी.साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि (आयुर्वेद)एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत), एल-एल.बी. (B.U.)
 प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव और आयुष ग्राम मासिक
पूर्व उपा. भारतीय चिकित्सा परिषद
उत्तर प्रदेश शासन 
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                              एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ परमानन्द वाजपेयी                                                                   आयुर्वेदाचार्य


डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 


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