कैसे बनता है, हायपरटेंशन का टेंशन ?






एलोपैथ में जिस व्याधि को रक्तचापया हायपरटेंशनकहते हैं उसकी आयुर्वेद में वर्णित रक्तगतवातसे पर्याप्त साम्यता है।
            आचार्य पुनर्वसु आत्रेय ने बताया है कि-
हेतुस्थानविशेषाच्च भवेद् रोग विशेषकृत्।


                               च.चि. २८/२३
            अर्थात्, शरीर में स्थित वायु हेतु और स्थान के अलग-अलग होने से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करती है। रक्तगतवात की उत्पत्ति में निम्नवत् कारण बनते हैं- गरिष्ठ, अभिष्यन्दी (दही, राजमा, उड़द, भिण्डी) जैसे पदार्थों का सेवन, अत्यन्त चिकनाई, कटु (मिर्च-मसाले), खट्टे, नमकीन पदार्थों का अति सेवन, अति भोजन, अति क्षारीय पदार्थों का सेवन (जैसे कोल्ड ड्रिंक आदि), तीक्ष्ण आहार, मद्य, दाह पैदा करने वाले, अति मधुर व शरीर को पुष्ट करने वाले पदार्थों का सेवन।


            मल, मूत्र, वमन, स्वेद, छींक, अपानवायु वेगों का धारण, भय, चिन्ता, अति व्यायाम आदि शारीरिक मानसिक श्रम, शोक, क्रोध और कुचेष्टायें करना।
            इनके सेवन करने से कफ और मेद धातु की वृद्धि या दुष्टि होकर स्रोतोरोध होता है तथा मानसिक कारणों से मानसिक क्षोभ होता है परिणामतः वात कुपित होता है। कफ और मेद धमनियों में स्थान संश्रय कर धमनीकाठिन्य उत्पन्न करते हैं एवं प्रकुपित व्यानवायु रक्त संचरण प्रक्रिया को मिथ्या गति प्रदान कर रक्तचाप को बढ़ा देती है परिणामतः रक्तगत वात के लक्षण उत्पन्न होते हैं।


            कई बार उपर्युक्त कारणों से कफ और मेदधातु की दुष्टि होकर स्रोतोरोध होने के कारण वात  प्रकुपित होता है और यह प्रकुपित वायु वृक्क को सिकोड़ देता है, नेफ्रान्स का क्षय कर देता है, हृदय में विकृति उत्पन्न कर देता है परिणामतः रक्तचाप बढ़कर रक्तगत वात के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
 विद्वानों ने रक्तगत वात में त्रिदोष, रक्त और मेद इन तीनों दूष्यों की भूमिका माना है। इस रोग में सम्प्राप्ति चक्र इस प्रकार निर्मित होता है -
दोषों को प्रकुपित करने वाले आहार-विहार का सेवन (निदान सेवन) ➡️ त्रिदोष प्रकोप ➡️ मानसिक विक्षोभ ➡️ कफ व मेद धातु वृद्धि ➡️ धमनियों में स्थान संश्रय ➡️ मार्गावरोध ➡️ वात (व्यान वायु) प्रकोप ➡️ व्यान वायु रक्त के साथ मेल ➡️ रक्तसंवहन की मिथ्यागति ➡️ रक्तगतवात (रक्तचापवृद्धि)
            यह ध्यान रखने की बात है कि इसमें अति प्रवृत्ति, संग और विमार्ग गमन तीनों प्रकार की स्रोतोदुष्टि होती है। इसका स्वरूप चिरकारी है और इस रोग का उद्भव आमाशय है।
आचार्य चरक ने रक्तगतवातमें निम्नांकित लक्षण बताये हैं –

रुजस्तीव्रा ससन्तापा वैवण्र्यं  कृशतारुचिः।
गात्रे चांरुषि भुक्तस्य स्तम्भश्चासृग्गतेऽनिले।।
च.चि.२८/३१
तीव्ररुजा (Pain), संताप (Burning Sansation), त्वचा में विकृत वर्ण की  उत्पत्ति (Discolouration), कृशता (Weakness), अरुचि (Anorexia), शरीर में छोटी – छोटी फुन्शियाँ निकलना और भोजन के बाद शरीर में जकड़ाहट (Stiffness after meals)

आचार्य चरक ने रक्तावृत वात के जो निम्नांकित लक्षण बताये हैं –
रक्तावृते सदाहार्तितस्त्वङ्ग मांसान्तरजो भृशम्।
भवेत् सरागः श्वयथुर्जायन्ते मण्डलानि च।।
च.चि..२८/६३।।
            रक्तावृत वात व्याधि में दाह, त्वचा व मांसपेशी में दाह, लालिमायुक्त शोथ और मण्डलोत्पत्ति लक्षण होते हैं।
            योगरत्नाकार ने रक्तगत वात के लक्षण इस प्रकार बताये हैं-
पादयोश्च भवेद्दाहस्त्वकस्फोटः श्वयथु क्लमः।
रक्तस्रावः स्पन्दनं च रक्तवातस्य लक्षणम्।।
            पैरों में दाह, त्वक् स्फोट (Bilsters), श्वयथु (Oedema), क्लम (अकारण थकावट यानी उत्साहहीनता), रक्तस्राव, स्पन्दन (Palpitation), शरीर में कम्पन (Tremors) होता है।
चिकित्सा- आयुर्वेद में इस रोग की चिकित्सा एलोपैथिक की भाँति नहीं है कि एक गोली दे दी गयी जिससे रक्तचाप कुछ घण्टों के लिए कम हो गया किन्तु धीरे-धीरे फिर बढ़ना शुरू हो गया। अंग्रेजी चिकित्सा में दवाइयों की मात्रा बढ़ती गयी, दवाइयों का प्रभाव घटता गया तो उधर हृदय, गुर्दे व मस्तिष्क की क्षमता घटती गयी।
     आयुर्वेद चिकित्सा करते समय ध्यान रखना चाहिए कि यदि पित्त का अनुबन्ध है तो उच्च रक्तचाप में चन्द्रकला रस, मोती पिष्टी, जहर मोहरा, खताई पिष्टी, जटामांसी आदि के साथ मांस्यादि क्वाथ का भी सेवन कराना चाहिए।
     कुछ मामलों में पुनर्नवामूल चूर्ण और अश्वगंधा चूर्ण तथा जहरमोहरा खताई पिष्टी का योग भी अच्छा कार्य करता है।
     निरन्तर वात प्रकुपित रहने और वातवर्धक आहार-विहार करने से स्नायु दौर्बल्य बढ़ता जाता है और व्यक्ति उच्च रक्तचाप से ग्रस्त हो जाता है। यदि रक्तगतवात ने यह स्नायु दौर्बल्य उत्पन्न कर दिया है तो जवाहर मोहरा (नम्बर-१) योगेन्द्र रस, रसराज, वृहद् वात चिन्तामणि रस, अश्वगन्धा चूर्ण, प्रवालपिष्टी आदि बहुत लाभप्रद हैं। यदि रक्तचाप वृद्धि हृद्दौर्बल्यजन्य है तो प्रभाकर वटी, नागार्जुनाभ्र रस, अर्जुन त्वक् चूर्ण, पोहकरमूल चूर्ण, मोती पिष्टी, हृदयार्णव रस आदि संयोज्य हैं।


     रक्तचाप का उपचार करने के लिये हमने रसदोषान्तक रसका निर्माण किया है। यह आयुष ग्राम ट्रस्ट का स्वानुभूत योग है। शु.पारद, शु. गन्धक, ताम्र भस्म को बराबर-बराबर लेकर ७ भावनायें त्रिफला क्वाथ, ७ भावनायें मकोय स्वरस और ७ भावनायें अर्जुन त्वक् क्वाथ की देकर (प्रत्येक भावना में अच्छी तरह घुटाई का ध्यान रखते हैं) रखवा देते हैं। इसका नाम हमने रसदोषान्तक रस रखा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यदि रक्तचाप १४०/९५ एमएम/एचजी से अधिक है तो उसे हायपरटेंशन माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और मेडिकल सांइस के अनुसार ९९ प्रतिशत ऐसे व्यक्ति उच्च रक्तचाप के रोगी हैं जिनमें कोई आवयविक कारण नहीं ढूँढा जा सकता। इसके अलावा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार वृक्कदोष, हृदय विकार, अंतःस्रावी ग्रन्थि विकार, स्नावयिक विकार भी उच्च रक्तचाप के कारण होते हैं।
            गर्भ विषमयता, ड्रग का दुरुपयोग, विषविकार आदि भी रक्तचाप वृद्धि में कारण बनते हैं।


            आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक समय था जब एलोपैथ को अपनी दवाओं पर बड़ा अहंकार था, उसके लिए पथ्य’ (परहेज) शब्द एक अवैज्ञानिक, दकियानूसी और बेबुनियाद शब्द था। जबकि आयुर्वेद चिकित्सा की नींव ही पथ्य (परहेज) पर है।
जो भी हो, सच तो सच होता है, एलोपैथिक दवाइयाँ निष्फल होने लगीं, एलोपैथ का अहंकार टूटने लगा। तब उसने भी पथ्य (परहेज) और खान-पान पर अनुसंधान करना शुरू किया। अब एलोपैथ ने उच्च रक्तचाप के रोगियों को बताना शुरू किया कि मॉडर्न मेडिकल साइंस के अनुसार तेल, मसालेदार और नमकीन आहार वर्जित हैं, नमक और वसा का परहेज करें, नियमित व्यायाम और योगासन का अभ्यास करें, मरीज अपनी लाइफ स्टाइल चेंज करें, मूत्रप्रवर्तक आहार लें।
            आयुर्वेद ने तो हजारों वर्ष पूर्व नमक के बारे में यह बता दिया थ कि लोहित ..........विकारान् जनयति।। च.सू. २६/३
लवण रस का अतिसेवन रक्तगत विकारों को उत्पन्न करता है। चरक विमान स्थान में लवण के अति सेवन का परिणाम दोषसञ्चयानुबन्धम्। दोष संचय कारक कहा गया है।
            उच्च रक्तचाप के रोगी को पुराना चावल, गो दुग्ध, सेव, अंगूर, पपीता, अनार, केला, संतरा, अल्पमात्रा में गोघृत, सेंधव लवण, अर्जुन घृत, ब्राह्मी घृत, जौ, ज्वार, मूँग, अरहर, पत्तागोभी, राजमा के फलियों की रसदार सब्जी, कोदों, साँवा आदि लघु आहार सेवन करना चाहिए।

साप्ताहिक या मासिक उपवास, व्यायाम, समय पर भोजन, और निद्रा, पूरी नींद, ब्रह्मचर्य का पालन, मल-मूत्रादि वेगों को धारण न करना, क्रोध, शोक, चिंता, तनाव से दूर रहना, लंघन आदि हितकर है।
            नमक, नमकीन, घी, कफ और चर्बी बढ़ाने वाले आहार, उड़द, राजमा, नया चावल, मिठाइयाँ, दूध की बनी चीजें, मलाईयुक्त दही, दूध, मिर्च, मसालेदार पदार्थ, ब्रेड, पकौड़ा, अण्डे, मांस-मछली, तम्बावूâ, स्निग्ध आहार, कोल्ड ड्रिंक, मद्य सेवन, पूर्व का भोजन बिना पचे पुनः भोजन, अधिक जल सेवन वर्जित करें।
            ऐसे ही क्रोध, चिंता, अत्यधिक शारीरिक श्रम, शोक, लगातार बैठे रहना, अतिशीत स्थान में निवास, शीतल जल से स्नान आदि वर्जित है।
            हमें आशा है कि इस लेख से उच्च रक्तचाप पीड़ित रोगी लाभान्वित होंगे तथा उच्च रक्तचाप से अनेक व्यक्ति बचाव भी करेंगे।


डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी
डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी एक प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। शास्त्रीय चिकित्सा के पीयूष पाणि चिकित्सक और हार्ट, किडनी, शिरोरोग (त्रिमर्म), रीढ़ की चिकित्सा के महान आचार्य जो विगड़े से विगड़े हार्ट, रीढ़, किडनी, शिरोरोगों को शास्त्रीय चिकित्सा से सम्हाल लेते हैं । आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम, दिव्य चिकित्सा भवन, आयुष ग्राम मासिक, चिकित्सा पल्लव और अनेकों संस्थाओं के संस्थापक ।



इनके शिष्यों, छात्र, छात्राओं की लम्बी सूची है । आपकी चिकित्सा व्यवस्था को देश के आयुष चिकित्सक अनुशरण करते हैं ।


अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमाम ||

सभी कर्तव्यों में मध्यम मार्ग का अनुसरण करना चाहिए | किसी एक के प्रति आशक्ति न रखें ||


डॉ. अर्चना वाजपेयी

डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (मेडिसिन आयु.) में हैं आप स्त्री – पुरुषों के जीर्ण, जटिल रोगों की चिकित्सा में विशेष कुशल हैं । मृदुभाषी, रोगी के प्रति करुणा रखकर चिकित्सा करना उनकी विशिष्ट शैली है । लेखन, अध्ययन, व्याख्यान, उनकी हॉबी है । आयुर्वेद संहिता ग्रंथों में उनकी विशेष रूचि है ।



सरकार आयुष को बढ़ाये मानव का जीवन बचाये!!
     सरकार को फिर से भारत में अंग्रेजी अस्पताल और अंग्रेजी मेडिकल कॉलेजों की जगह अच्छे और समृद्ध आयुष संस्थान खोलने चाहिए तथा उनसे पूरी क्षमता से कार्य लेना चाहिए। इससे भारत का मानव हार्ट के ऑपरेशनछेड़छाड़ स्टेंट और डायलिसिस जैसी स्थितियों से बचकर और हार्ट को स्वस्थ रख सकेगा। क्योंकि हार्ट के रोगी पहले भी होते थे आज भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिनका सर्वोच्च समाधान आयुष में है। आयुष ग्राम चित्रकूट एक ऐसा आयुष संस्थान है जहाँ ऐसे-ऐसे रस-रसायनों/ औषध कल्पों का निर्माण और संयोजन करके रखा गया है जो जीवनदान देते हैं। पंचकर्म की व्यवस्था एम.डी. डॉक्टरों के निर्देशन में हो रही हैपेयाविलेपीयवागू आदि आहार कल्पों की भी पूरी उपलब्धता है इसलिये यहाँ के ऐसे चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
   
आयुष ग्राम चिकित्सालय:चित्रकूट 
   मोब.न. 9919527646, 8601209999
 website: www.ayushgram.org



  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी        आयुर्वेदाचार्यपी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.) एन.डी.साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि (आयुर्वेद)एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )
 प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                              एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ परमानन्द वाजपेयी                                                                   आयुर्वेदाचार्य



डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 


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