सभी ज्वरों की परमौषधि है करुणार्द्र और शुद्ध मन

  november 6,

आचार्य वाग्भट्ट ने ज्वर चिकित्सा अध्याय-१ में १७२ सूत्रों में ज्वर की चिकित्सा के बारे में बहुत बताया, पर १७३वें सूत्र में ज्वर की सम्पूर्ण चिकित्सा भी बता दी और सम्प्राप्ति भी। वह सूत्र है-
‘‘करुणार्द्र मन: शुद्धं सर्वज्वरविनाशनम्।।’’
                 मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि इस १७३वें सूत्र में ज्वर की सम्पूर्ण सम्प्राप्ति भी है और सम्प्राप्ति विघटन रूपी सफल, सटीक चिकित्सा भी है तथा बचाव भी है।
            आपको लगता होगा कि यह मेरी गर्वोक्ति है पर ऐसा नहीं है। यह सूत्रज्वर चिकित्सा का सम्पूर्ण सूत्र है।
करुणार्द्रम मन: शुद्धं सर्वज्वर विनाशनम्।
                अर्थात् शुद्ध (दोषरहित), करुणा से भरा मन सभी प्रकार के ज्वरों को मिटा देता है।
            तो अब हम इसी सूत्र के आधार पर सम्प्राप्ति पर आते हैं।
सम्प्राप्ति क्या-
१.    रोगस्य सम्यक् प्राप्ति: सम्प्राप्ति:।
२.    यथा दुष्टेन दोषेण यथा चानुविसर्पता।
       निर्वृत्तिरामयस्यासौ सम्प्राप्तिर्जातिरागति:।। वाग्भट्ट।।
१.    किन-किन कारणों से दोषरोग उत्पत्ति करने योग्य तैयार हुये।
२.    किस प्रकार विसर्पण किया यानी आगे बढ़े।
३.    किस प्रकार रोग की उत्पत्ति की।
                उपर्युक्त सूत्र के आधार पर ज्वर की सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित होती है-
संतप्तमनोऽशुद्धं सर्वज्वरकारकम्।
                अर्थात् संतप्त और अशुद्ध (विकृत) मन सभी ज्वरों को पैदा करता है। जब करुणा से ओत-प्रोत और शुद्ध मन सभी ज्वरों को नष्ट करता है तो संतप्त और विकृत (अशुद्ध) मन सभी ज्वरों को उत्पन्न करने में सक्षम भी है।
            जब हम मन को संतप्त और अशुद्ध करने वाले कारकों पर विचार करते हैं तो पाते हैं रज और तम दोष मन को संतप्त और अशुद्ध करने वाले केवल दो ही कारक हैं-
मानसो पुनरुदिष्ट रजश्च तम एव च।।
च.सू. १/५७।।
                रज और तम दोषों को प्रवृत्त करने और बढ़ाने में कारण बनता है गलत खान-पान और आचरण। क्योंकि-
१.    आहार से ही मनोमय कोष का पोषण होता है।
उपनिषद् इस बात का प्रमाण देते हैं-
आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धि: सत्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृति:।।
                श्रीमद्भगवद्गीता भी इस बात का प्रमाण देती है-
२.    कट्वम्ललवणात्युष्णरुक्षतीक्ष्णविदाहिन:
आहाराजस्येष्टा दु:खशोकामयप्रदा:।
३.    यातयामं गत रसं पूतं पर्युसितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं आहारं तामसप्रियम्।।
श्रीमद्भगवद्गीता १७/९-१०।।
                कड़वे, खट्टे नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करन ेवाले भोज्य पदार्थ दु:ख, शोक और रोग को उत्पन्न करने वाले होते हैं, ये राजोगुणी व्यक्ति को बहुत प्रिय होते हैं। ऐसे ही बहुत देर का रखा हुआ रसहीन, दुर्गन्धित, बासी, जूठा और अमेध्य भोज्यपदार्थ तमोगुण को बढ़ाता है। यदि कोई ऐसा आहार पसन्द करता है तो उसे तमोगुण समझ लेना चाहिए, यह मान लेना चाहिए कि इसका विवेक कार्य नहीं करता, स्वयं दु:खी है और अन्य को भी दु:खी करेगा।
            भारत के ऋषि श्रीमद्भगवद्गीताकार ने तो यह बात बहुत पहले प्रतिपादित कर दी थी पर इतने सालों बाद अमेरिका के वैज्ञानिकों ने ४५०० लोगों पर किये गये खोज में भी यही पाया कि रोज-रोज तीखा खाना याददाश्त सम्बन्धी समस्यायें दे सकता है।
            ऐसे ही अमेरिका के कार्नेल मेडिसिन इंस्टीट्यूट के असिटेण्ट प्रोफेसर ग्यूसेप फारको ने कहा कि हमने लम्बे समय तक किये गये रिसर्च में पाया है कि नमक की उच्च मात्रा यदि शरीर में जाती है तो व्यक्ति की याददाश्त कमजोर हो जाती है और डिमेंशिया जैसी खतरनाक मानिसक बीमारी हो जाती है। क्योंकि नमकमस्तिष्क में रक्त प्रवाह में रुकावट पैदा करने में योगदान देता है।
            पिछले वर्ष अमेरिका ने एक शोध रिपोर्ट में बताया कि केक और बिस्कुट जैसे बेक किये हुये पदार्थों को अधिक खाने से एक भयंकर मानसिक बीमारी डिमेंशिया होने की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए तो भारतीय ऋषि ने बासी भोजन को तामसी, अमेध्य बताया था।
                इस तथ्य पर आचार्य चरक का एक महत्वपूर्ण सूत्र पढ़ते हैं कि-
भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात् सम्पन्निकानां
सत्वानां शरीर गौरवमासीत् शरीरगौरवाच्छ्रम:, श्रमादालस्यम्, आलस्यात् सञ्चय:, सञ्चयात् परिग्रह: परिग्रहाल्लोभ: प्रादुरासीत् कृते।।
च.वि. ३/२३।।
                तत्रत्रेतायां लोभादभिद्रोह: अभिद्रोहानृतवचनम् अनृतवचनात् कामक्रोधमानद्वेषपारुष्याभिघात ताप शोक चिन्तोद्वेगादय: प्रवृत्ता:। ततस्तानि ... ... ... प्रजाशरीरिणि ... ... ... प्राग्व्याधिभिज्र्वरादिभिराक्रान्तानि।। चि.वि.
च.वि. ३/४-४-२।।
                इसी क्रम में एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है- महाचिकित्सक वैज्ञानिक चरक, चिकित्सा स्थान में ज्वर की प्रवृत्ति बताते समय लिखते हैं कि प्रवृत्तिस्तु परिग्रहात्।। अर्थात् ज्वर की प्रवृत्ति परिग्रह (लोभ) से। यह सूत्र इस बात को और अधिक प्रमाणित करता है कि ज्वर का बीज पड़ता है मानसिक दोषों से।
            करुणाद्र्र मन: शुद्धं सर्वज्वर विनाशनम् सूत्र पर आधारित ज्वर की सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित होती है-
            रज तम की प्रवृत्ति मनस्ताप (करुणाद्र्रता का अभाव), मन्दाग्नि/अपच रसदुष्टि  आमोत्पत्ति  रजो दोष (द्वारा वातवृद्धि:। क्योंकि- रजो बहुलां वायु: जिससे) आम का सर्वशरीर में प्रसरण, रज दोष द्वारा कोष्ठाग्नि का आशय से बहिर्गमन, फिर तम दोष की प्रवृत्ति परिणामत: स्रोतोरोध, सम्पूर्ण शरीर में उष्णता और ज्वरोत्पत्ति।
            दुनिया के महान् शल्य वैज्ञानिक हजारों साल पहले लिख चुके हैं कि- ईष्र्या, भय, क्रोध से ग्रस्त, लोभ (reedy), शोक, दीनता से पीड़ित और प्रद्वेष (मात्सर्य/Enemity) युक्त का किया गया, भोजन ढंग से पचता।
            अब एक प्रश्न बनता है कि क्या मनोदोष, मनस्ताप से भी मन्दाग्नि/आमोत्पत्ति होती है? अवश्य।
इर्ष्याभयक्रोधपरिक्षतेन, लुब्धेन रुग्दैन्य निपीडितेन
प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानं अन्नं न सम्यक् परिणाममेति।।
सु.सू. ४६/५०।।
                आप कह सकते हैं कि इस उक्त सूत्र में आम-दोषकी बात कहाँ कही गयी है। तो दूसरा स्पष्ट प्रमाण लें। 
कामक्रोधलोभमोहेष्र्याह्रीशोकमानोद्वेगभयोतप्तमनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते, तदप्यामेव प्रदूषयति।।
च.वि. २/८।।
                अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या, लज्जा, शोक, अभिमान, चिन्ता, भय से ग्रस्त मानसिक दशा में किया गया आहार आमदोषकी उत्पत्ति करता है।
                जब भी आमोत्पत्ति होगी तो जठराग्नि की मन्दता होगी ही। यह कार्य यह प्रमाणित करता है कि जठराग्नि की मन्दता हुयी तो सतोगुण घटा और रज-तम की प्रवृत्ति बढ़ी। क्योंकि-
सत्वजो बहुलोऽग्नि:। (सु.शा.१)
                यानी अग्नि सत्त्व रजप्रधान है। रजइसलिए है कि रजहमेशा प्रवृत्ति करता है यदि रज नहीं होगा तो अग्नि की प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती। यदि अग्नि सम्यक् तो सतोगुण सम्यक्, यदि अग्नि मन्द तो रजोगुण-तमोगुण की वृद्धि। क्योंकि सांख्यकारिका कार (१२) में इन गुणों का अन्योन्य मिथुनवृत्तिबताये गये हैं।
            सांख्यकारिका कार कहते हैं कि कोई भी एक गुण दूसरे दो गुणों को दबाकर कार्य करता है।
            अब चलें चिकित्सा यानी सम्प्राप्ति विघटन की ओर तो हम इसके लिए चरक सूत्र १६/३६ सूत्र को ले लेते हैं-
त्यागाद् विषमहेतूनां समानां चोपसेवनात्।
विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवा: समा:।।
                जिस प्रक्रिया से बीमारी उत्पन्न हुयी है उस प्रक्रिया को विघटित करते जायें और उत्पन्न बीमारी से जो क्षति हुयी है उसकी पूर्ति करना चाहिए। यही चरक का स्वभाव परमोवाद है।
            पर हमने अपने लेख के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की थी कि वाग्भट्ट का करुणाद्र्रं मन: शुद्धं सर्वज्वरविनाशनम्।।अ.हृ.चि. १/१७२।। सूत्र ज्वर की सम्प्राप्ति भी बताता है और विघटन भी। तो हम वहीं पर लौटकर आते हैं।
                उपर्युक्त सूत्र सिद्धान्त तब और प्रमाणित हो जाता है जब आचार्य चरक के चि. ३/१२ का हम अवलोकन कर लेते हैं-
देहिनं नहि निर्दोष ज्वर: समुपसेवते।।
च.चि. ३/१२
                इस प्रकार उपर्युक्त सूत्र को ध्यान में रखने हेतु ज्वर विनाश के लिए मन को करुणा से ओत-प्रोत और शुद्ध करना और रखना पड़ेगा। अब प्रश्न आता है कि मन में करुणा कैसे रहेगी या आयेगी तो ध्यान रखना होगा कि मन में करुणा कैसे आती है केवल और केवल सतोगुण से और मन शुद्ध रहता है केवल सतोगुण से।
                वह कैसे? तो आचार्य बताते हैं-
                तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांशत्वात्।
च.शा. ४/३६
                शुद्ध मननिर्दोष (रज और तम दोष रहित) होता है उसमें कल्याणांश होता है, जहाँ कल्याणांश है वहीं करुणा होती है कि जहाँ निर्दयता, व्रूâरता, हठ, क्रोध, अभिद्रोह होगा वहाँ करुणा फटक तक नहीं सकती।
चिकित्सा-
                                अब हम चिकित्सा पर चर्चा करते हैं जिसमें औषध, अन्न और होगा
चरक कहते हैं कि-
ज्वरे लंघनमेव।। च.सू. ३/३९।।
तो भाव प्रकाशकार कहते हैं-
ज्वरादौ लंघन प्रोत्कं’
ज्वरमध्ये तु पाचनम्।
इस बात को चक्रदत्त और स्पष्ट करते हैं-
ज्वरे पूर्वं लंघनेन क्षयं नयेत्।।
                                आपको लगता होगा कि वही पुरानी रटी-रटाई, सुनी-सुनाई बात हम बताने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है।
                ज्वर लंघनमेव च। इस चरकाचार्य जी के सूत्र में इतना गोपनीय विज्ञान और दर्शन भरा है जिसकी गहराई, वैज्ञानिकता समझकर उन्हें साष्टांग दण्डवत् करने का मन करता है।
                चरकाचार्य कहते हैं-
लंघनं स्वेदनं कालो यावग्वस्तिक्तको रस:।
पाचनान्यविपक्वानां दोषाणां तरुणे ज्वरे।।
च.चि. ३/४२।।
                लंघन, स्वेदन, काल (दोषों का अपना निश्चित काल), यवागू और तिक्त रस अविपक्व (आम) दोष का पाचन करते हैं जिसमें ज्वर मिटता है।
            चाहे आचार्य चरक को देखें या भाव मिश्र को या चक्रदत्त को सभी ने ज्वरमें लंघन की बात की है। लंघनशब्द में एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक शब्द है।
            पर एक कालखण्ड ऐसा आया कि हमारे देश में ज्वर रोगियों को लंघन के नाम पर महीनों निराहार रखा जाने लगा। जिससे अनेकों रोगी टूट जाते थे और आयुर्वेद की बदनामी होने लगी। लंघन की परिभाषा है-
यल्लाघवकरं देहं तल्लंघन स्मृतम्।।
                जिससे शरीर में लघुता आये वह लंघन है। चरकाचार्य लंघन के १० प्रकार बताते हैं।
            ज्वर में सभी भारतीय चिकित्सा ने लंघनइसीलिए बताया ताकि सतोगुण का आधान हो, मन सात्विक हो तथा रज और तम का निराकरण हो। क्योंकि- सतोगुण
सत्वं लघु प्रकाशकम्। सांख्यकारिका।।
                सतोगुण लघुहोता है और प्रकाशक होता है।
                महर्षि कश्यप कहते हैं-
सत्वं प्रकाशकं विद्धि।।
चक्रपाणि टीका में लिखते हैं-    सत्वं ह्यविकारि।।
चरक लिखते हैं- (सत्वं) शुद्धं अदोषम्।।
च.शा. ४/३६।।
                स्पष्ट हो गया न कि लंघन का मतलब लघुता लाना। लघुता का मतलब सतोगुण का आधान करना। अब चाहे यह कार्य औषधि से करें, ज्ञान-विज्ञान, धैर्य, स्मृति, सामाधि से करें या आहार से करें या तीनों से।
                जब सतोगुण आ जायेगा तो अविकारिता और अदोषता आ जायेगी।
देहिनं नहि निर्दोष: ज्वर: समुपसेवते।। (च.चि. ३/१२)
और 
करुणाद्र्रं मन: शुद्धं सर्वज्वर विनाशनम्।।
यवाग्वस्तिक्तको रस:?         
                                ज्वर की औषध में तिक्तरस प्रयोग का भी अद्भुत वैज्ञानिक रहस्य पूर्ण है। लघनं स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रस:।।
                चरक कहते हैं कि तिक्त रस का सृजन वायु±आकाश से है पर वाग्भट्ट कहते हैं कि यह आकाश और वायु महाभूत से निष्पन्न है। जहाँ पर आकाश होगा वहाँ पर सतोगुण होता ही है। कैसे-
सत्वबहुलामाकाशम्।। सु.शा.।।
                                अर्थात् आकाश सतोबहुल है।
                ध्यान रखें, ‘तिक्त रसआकाश और वायु महाभूत के कारण ही लघुहोता है। योगवाह: परं वायु:। के अनुसार वायुयोगवाही होने से आकाश के गुण को बढ़ाता है। सत्वबहुलमाकाशम्।। सु.शा.।।
और ‘‘सत्वं लघु प्रकाशकम्।।’’
                इस प्रकार, तिक्त रस का सेवन लघुताको उत्पन्न करता है, जहाँ लघुता (हल्कापन) होगा और प्रकाश होगा, करुणा होगी वहाँ सतोगुण होगा। जहाँ सतोगुण होगा और जितने अंशों में होगा वहाँ रज, तम या तो रह नहीं सकते या कमजोर पड़ जायेंगे। फिर ज्वर नहीं रहेगा। आप कहेंगे-
करुणाद्र्रं मन: शुद्धं सर्वज्वर विनाशनम्।
                                एक उदाहरण और समझने योग्य है लघु गुण का।
                जग जननी सीता जी की खोज में हनुमान जी लंका में प्रवेश करने को थे तो उन्होंने-
अतिलघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठेउ नगर सुमिरि भगवाना।।
                हनुमान जी को अतिलघुरूप इसलिए रखना पड़ा क्योंकि लंका तमोगुण और रजोगुणी प्राणियों (राक्षसों) से भरी-पूरी थी और तमोगुणी, रजोगुणी वातावरण के परास्त करने के लिए सतोगुण का अभिर्भाव और अभिवर्धन करना पड़ेगा। सतोगुण का अर्थ है लघु प्रकाशकम्।’ (सांख्यकारिका) यानी लघु और प्रकाशित। जहाँ लघुता और प्रकाश है वहाँ सत्वगुण है, इसीलिए हनुमान जी अतिलघु हुये तथा अग्नि की तन्मात्रा रूपको अभिवर्धित किया यानी तेज (प्रकाश) को बढ़ाया। जब सतोगुण और प्रकाश आधान होगा तो ईश्वर की स्मृति स्वत: बन जाती है। तभी तामसी, राजसी शक्तियों को आप पराजित और विध्वंस कर सकते हैं यही किया हनुमान जी ने।
                हम फिर लिख दें कि लघुता आने पर सत्व गुण और सतोगुण आने पर ज्वरहीनता। जब भारीपन होगा तो-
स्वेदावरोध: सन्तापो सर्वांग ग्रहणं तथा।
युगपद् यत्र ऐत च स ज्वरो व्यपदिश्यते।
सु.उ. ३९/१३।।
                स्वेदावरोध, व सर्वांग ग्रहण होगा इसमें स्रोतसदुष्टि का संग दोष होगा। (चरक कहते हैं रज: संगेन।) जहाँ संगहोता है वहाँ रज दोष होता ही है।
            संताप होगा रजके कारण ज्वर होगा। जहाँ रज होगा वहाँ तम आ ही जाता है।
नरजस्क: तमोप्रवत्र्तते।। चरक विमान।।
                एक और रहस्य पर चर्चा कर दूँ कि तिक्तरसही एक ऐसा रस है जिसमें चरक ने खोजा था कि यह- प्रल्हाद कारक: (२६/७८) है तो जहाँ ज्वर में- संताप: स्वेदावरोध: सर्वांगग्रहणं (जकड़ाहट) होता है वहीं तिक्त रस स्पूâर्ति देता है यानी जकड़ाहट को मिटाता है।
                        ज्वर में चरक ने कषाय रसक्यों वर्जित किया है तो कषाय रस वायु±पृथ्वी महाभूत है। रजो बहुलां वायु: और तमोबहुलां पृथ्वी होने के कारण यह रसरज और तम को बढ़ायेगा, मन विकारी होगा, ‘दूषित होगा।जिसका परिणाम यह होगा कि ज्वर जटिल होगा। विचार करें इतना गहन और वैज्ञानिक चिन्तन था हमारे प्राचीन चिकित्सा वैज्ञानिकों का जिन्हें आचार्यकहते थे।
            एक प्रश्न और आपके मन में आ सकता है कि अम्ल रस भी लघु है, कटु भी लघु है और तिक्त भी लघु तो लघुसे सतोगुण होता है तो ज्वर में कटु और अम्ल का क्यों नहीं प्रयोग किया। तो समाधान शास्त्र स्वयं दे रहा है-
अम्लात् कटुस्ततस्तिक्तो लघुत्वादुत्तमो मत:।
च.सू. २६/५६
                तिक्त रस ऐसा लघु गुण लिए है तो उत्तम लघु है किन्तु कटु और अम्ल रस निकृष्ट लघु हैं ये रज और तम से सबल सम्बन्ध बनाये हैं, वायु±अग्नि के कारण और पृथ्वी±अग्नि महाभूत के कारण। ध्यान रखें- रजोबहुलां वायु:। तमोबहुलां पृथ्वी।।वायु योगवाह: है, अग्नि को भड़का देगा।
            अब तो प्रमाणित हो गया न कि सतोगुणसे मन के ओतप्रोत होने पर ज्वर टिक ही नहीं सकता? और सतोगुण लघु प्रकाशकम् है।
            इसी प्रकरण में एक और मजेदार प्रमाण देखने योग्य है- भगवान् धन्वन्तरि से पूछा कि हम वैâसे माने कि व्यक्ति ज्वर से मुक्त हो गया तो उन्होंने कहा-
लघुत्वं शिरस: स्वेदो मुखमपाण्डुपाकि च।
क्षवथुश्चान्नकाङ्क्षा च ज्वर मुक्तस्य लक्षणम्।।
सु.उ. ३९/३२०।।
पहला लक्षण- लघुत्वम्यानी सतोगुण मिल जाय।
            दूसरा लक्षण शिरस: स्वेदो जो लंघनका लक्षण है, मुख में अपाण्डु हो (यह भी लघुता का लक्षण है। यदि मुख पाण्डुता युक्त है तो स्रोतोरोध है जो गुरुता का लक्षण है।) पाचकाग्नि का स्वस्थ होना, छींकें आना, भोजन में रुचि ये सब के सब लघुताकी निशानी है। ध्यान  रहे कि यहाँ पाकिका अर्थ कुछ लोग मुख पकना लिखते हैं जो ठीक नहीं है।
            चिकित्सक को इतना सब ध्यान देना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह जानता है कि स्वस्थ तभी है
 जब-
समदोष: समाग्निश्च समधातु मलक्रिया:।
प्रसन्नात्मेन्द्रिय मना: ... ... ...।।
                इस प्रकार औषधियों में कालमेघलौह, सर्वज्वरहरलौह, अभ्रक भस्म, कालमेघनवायस लौह, महासुदर्शनघन वटी, चूर्ण, क्वाथ, गिलोय, चिरायता, पंचतिक्त, सप्तपर्ण, सिनकोना, ब्राह्मी, ऐन्द्री, शंखपुष्पी, सर्पगन्धा, रास्ना, कुटकी, कुपीलु, भंगा के भी ज्वर में एलोपैथिक से श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं। हमने कभी भी ज्वर में अंग्रेजी दवा प्रयोग नहीं की। अभ्रक की श्रेष्ठ मात्रा नृसार की श्रेष्ठ मात्रा देकर ज्वर को उतारा है।
                अन्न (आहार)- जब आहार की चर्चा करते हैं तो ध्यान देने की बात है कि सतोगुण के आधान के लिए सतोगुणी आहार होना आवश्यक है।
आयुसत्वबलारोग्य सुखप्रीति विवर्धना:।
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा: हृद्या: आहार: सात्विक प्रिया:।।
श्रीमद्भागवत गीता।।
विहार- रजोप्रवर्तक:। रजोदोष प्रवृत्ति कारक होता है इसीलिए चरक ने प्रवृत्ति कारक कर्मों को गति देने वाले कर्मों को वर्णित किया।
व्यायामं च व्यवायं च स्नानं चंक्रमाणि च।
ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत्।।
च.चि. ३/३३२।।
                                मैंने इस लेख के प्रारम्भ में कहा था कि मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि ‘‘करुणाद्र्रं मन: शुद्धं सर्वज्वर विनाशनम्।’’ ज्वर चिकित्सा, बचाव, सम्प्राप्ति का सम्पूर्ण सूत्र है। तो सभी को पहले लगा होगा कि ये मेरी गर्वोक्ति है। पर विद्वान् वैद्यों को मैं स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि प्रतिज्ञा का अर्थ होता है- प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम्।’ (चि.वि.) जिस वचन को शास्त्रीय प्रमाण द्वारा सिद्ध करना हो उसे प्रतिज्ञा कहते हैं। मैंने गुरुजनों की कृपा से इसे पूरा किया।
                अंत में मैं वाग्भट्ट के इस सूत्र-
भिषजां साधुवृत्तानां भद्रागमशालिनाम्।
अभ्यस्त कर्मणां भद्रं भद्रं भद्राभिलाषिणाम्।।
                सदाचारी चिकित्सकों का कल्याण हो, आगम माने शास्त्र के गूढ रहस्यों को समझने, जानने वालों का कल्याण हो, जिन्होंने गुरु चरणों में बैठकर शास्त्र पढ़ा हो उनका भला हो और जो संसार का भला चाहते हों उनका भला हो।




डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी


डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी एक प्रख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। शास्त्रीय चिकित्सा के पीयूष पाणि चिकित्सक और हार्ट, किडनी, शिरोरोग (त्रिमर्म), रीढ़ की चिकित्सा के महान आचार्य जो विगड़े से विगड़े हार्ट, रीढ़, किडनी, शिरोरोगों को शास्त्रीय चिकित्सा से सम्हाल लेते हैं । आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम, दिव्य चिकित्सा भवन, आयुष ग्राम मासिक, चिकित्सा पल्लव और अनेकों संस्थाओं के संस्थापक ।

इनके शिष्यों, छात्र, छात्राओं की लम्बी सूची है । आपकी चिकित्सा व्यवस्था को देश के आयुष चिकित्सक अनुशरण करते हैं ।




आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
   
आयुष ग्राम चिकित्सालय:चित्रकूट 
   मोब.न. 9919527646, 8601209999
 website: www.ayushgram.org



  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी        आयुर्वेदाचार्यपी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.) एन.डी.साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधिएम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )
 प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव

               


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