७९ साल की उम्र और डायलेसिस में फँसे रोगी को ऐसे जीवन देती आयुष चिकित्सा !!

डायलेसिस से मुझे मरणासन्न किया गया था, आयुष ग्राम में मुझे जीवनदान मिला !!



श्री राममणि द्विवेदी और उनके बेटे 
मेरी उम्र ७९ साल है, मैं वन विभाग से सेवा निवृत्त हूँ। मुझे २०१८ में अचानक पैरों में सूजन आ गयी, भूख नहीं लगती थी, खाना खाने के तुरन्त बाद वमन हो जाता था तो मुझे नागपुर के एक अंग्रेजी हॉस्पिटल ले जाया गया, वहाँ पर डॉक्टरों ने सभी जाँचें करवायीं। जाँच में सबकुछ नार्मल आया, सिर्फ शुगर बढ़ा बताया गया। मुझे नागपुर में ५ दिन तक भर्ती रखा गया लेकिन कोई आराम न मिलने पर मुझे नागपुर के ही दूसरे हास्पिटल में रिफर कर दिया गया, वहाँ  पर ले जाकर मेरा फिर से इलाज शुरू हुआ, वहाँ पर मुझे १५ दिन भर्ती रखा गया, फिर डिस्चार्ज कर दिया गया और घर पर ही दवा चलती रहीं, लेकिन कुछ ज्यादा आराम न मिलने पर मैं जून २०१९ में फिर से हास्पिटल (नागपुर) गया, वहाँ पर फिर से जाँच हुयी, जाँच में पता चला कि शुगर के साथ-साथ मेरी किडनी भी खराब हो गयी है। यह सुनकर मैं और मेरा परिवार बहुत परेशान हो गया कि अंग्रेजी दवा चलते-चलते मेरी किडनी की भी समस्या आ गयी।
मेरा बेटा जो आर्मी में है मुझे अपने सैनिक हॉस्पिटल, दिल्ली ले गया। सैनिक हॉस्पिटल पहुँचने के पहले मेरी ३ डायलेसिस हो गयी थी, फिर मेरा इलाज दिल्ली में चला, लेकिन आराम नहीं मिल रहा था। तभी मेरे गाँव के एक रामायण पटेल जी जो बहुत पहले आयुष ग्राम चित्रकूट में अपनी किडनी का इलाज करवाया था उनकी डायलेसिस चलती थी वे अब बिल्कुल स्वस्थ हैं से आयुष ग्राम चिकित्सालयम, चित्रकूट के बारे में पता चला। मेरा लड़का मुझे १४ जुलाई २०१९ को आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट लेकर आया, जब मैं यहाँ आया था तब मुझे पकड़कर लाया गया था, मैं अपने आप से २ कदम भी नहीं चल पा रहा था। उल्टी तो रुक ही नहीं रहीं थीं, अंग्रेजी दवा चल रही थी इन सबसे परेशान जब मैं यहाँ आया तो यहाँ के डॉक्टरों ने अच्छी तरह देखा और कहा कि आप बिल्कुल स्वस्थ हो जायेंगे, कोई डायलेसिस नहीं करवानी पड़ेगी न ही कोई अंग्रेजी दवा खानी पड़ेगी। मैं १५ दिन भर्ती रहा प्रतिदिन डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (आयु.) राउण्ड में आतीं और देखतीं। मुझे १५ दिन बाद पंचकर्म होने के बाद १ माह की दवा देकर घर भेज दिया गया। मेरी घर पर दवा चलती रही, जैसा डॉक्टर साहब ने बताया था, बिल्कुल वैसा ही हुआ। मुझे डेढ़ माह में ८० प्रतिशत आराम है। कोई डायलेसिस नहीं, सभी एलोपैथी छूट गयीं, मैं और मेरा परिवार बहुत खुश मैं तो सभी से कहता हूँ कि यदि कोई समस्या हो तो पहले आयुष चिकित्सा अपनायें।

 - राममणि द्विवेदी
 मोहनिया, जिला- सीधी (म.प्र.)
     मोबा.नं.- ६२६४३८९२९१, 7389482404

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आयुर्वेद विज्ञान रीति से की गयी चिकित्सा अपना ऐसा प्रत्यक्ष प्रभाव और परिणाम देती है कि अंग्रेजी अस्पतालों और डॉक्टरों ने बिगाड़े गये तथा आसन्न मृत्यु रोगी तक नवजीवन पा जाते हैं। आयुष ग्राम चिकित्सालयम्, चित्रकूट रोज ऐसी उपलब्धियाँ राष्ट्र और आयुष जगत को समर्पित कर रहा है- ‘‘इदं राष्ट्राय न मम’’।। 

उसी क्रम में यह नया केस-

१२ जुलाई २०१९ को आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालयम की ओपीडी में एक फौजी अपने ७९ वर्षीय पिता श्री राममणि द्विवेदी को मोहनिया, जिला-सीधी (म.प्र.) से लेकर आये।
उनका ओपीडी रजिस्टे्रशन नम्बर १४४/४७ हुआ।

रोगी बहुत ही इमरजेन्सी (आत्यायिक अवस्था) में था, आयु भी ७९ वर्ष थी तथा एलोपैथिक दवाइयों और अस्पतालों से बिगड़ा हुआ था, लेकिन आयुर्वेद की आशुकारी, आत्यायिक निवारक और प्राणरक्षक चिकित्सा के बल पर हमें पूरा विश्वास था कि इन्हें जीवनदान मिल सकेगा।

➡️ श्री राममणि द्विवेदी (रोगी) के रोग के सम्प्राप्ति का अध्ययन किया गया तो पाया गया कि रोगी को सबसे पहले वर्ष २०१८ में मधुमेह हुआ, नागपुर ले गये वहाँ से अंग्रेजी दवा चलती रही।
➡️ २ जून २०१९ को बुखार आया तो फिर नागपुर के अंग्रेजी अस्पताल ले गये, वहाँ बुखार का इलाज करना शुरू कर दिया, तब भी उल्टी नहीं बन्द हुयी तो जाँच कराया बताया कि इनकी ‘किडनी फेल’ हो गयी।
यूरिया १७० एमजी/डीएल, क्रिटनीन ५.६, सोडियम ११९, पोटेशियम ४.५। इस पर MIDAS ''Multispeciality Hospital Nagpur’’  में डायलेसिस कर दी गयी।

डायलेसिस के बाद और हालत खराब हो गयी, तो श्री राममणि द्विवेदी के फौजी बेटे उन्हें दिल्ली सैनिक हास्पिटल ले गये, वहाँ भी डायलेसिस करने लगे। हफ्ते में दो डायलेसिस, ७९ साल का शरीर धराशायी हो गया। तब उन्होंने विकल्प तलाशना शुरू किया और आयुष ग्राम (ट्रस्ट), चित्रकूट पहुँचे।

उस समय रोग के उपद्रव इस प्रकार थे-

✔️ रोगी की भयंकर साँस फूल रही थी, किडनी की खराबी के  कारण।
✔️ रोगी के मुँह में १ माह से भोजन नहीं गया था।
✔️ भोजन के प्रति भयंकर अरुचि थी, यदि मुँह में कुछ डाला भी जाता तो राममणि द्विवेदी जी उसे वारित कर देते।
✔️ ब्लडप्रेशर हाई था।
✔️ कराह, घबराहट, अनिद्रा, शिथिलता और अनिद्रा थी। रोगी  एक कदम भी नहीं चल पा रहा था।
✔️ नागपुर, सैनिक हास्पिटल दिल्ली में इलाज कराया जा रहा  था पर रोग तथा रोगी बिगड़ता गया।
✔️ नागपुर और सैनिक हास्पिटल दिल्ली में ५ डायलेसिस  कर दीं और आगे भी डायलेसिस के लिए कहा।
✔️ रोगी श्री राममणि द्विवेदी जी वन विभाग से रिटायर्ड थे।


रोगी की केसहिस्ट्री और दर्शन, स्पर्श, प्रश्न परीक्षा के आधार पर रोग की सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हो रही थी-

वयजन्य वातप्रकोप ➡️ कफ पित्त क्षय ➡️ धात्वाग्नि मन्दता ➡️ आम निर्माण ➡️ वसा, मज्जा, लसिका, ओज का वात द्वारा मूत्राशय में गमन ➡️ प्रमेह।

‘‘क्षीणेषु दोषेष्वकृष्य वस्तौधातून् प्रमेहाननिल: करोति।’’
च.चि. ६/६।।

ऐसे लक्षण भी आ गये थे-

स्वेदोङ्गगन्ध: ... ... ... पिपीलिकाश्च।। च.चि. ६/१३-१४।।
तेषां तु पूर्वरूपाणि हस्तपादतलदाह: ... नखानाम्।।
सु.नि. ६/१५।।
दन्तादीनां मलाढ़यत्वं प्रागूपं पाणिपादयो:।
दाहचिक्कणता देहे तृट्स्वाद्वस्यिं च जायते।।
मा.नि. ३३/१५

शरीर से विस्रगन्ध, शरीर के अंगों का ढीलापन, नेत्र, कान, जीभ, दाँतों का मलिन रहना, केश, नाखूनों की अतिवृद्धि, तालु, कण्ठशोष, शीतल द्रव्यों की कामना, मुँह में मिठास बना रहना, प्यास लगना, हाथ-पैरों में जलन, श्वास लेने में कठिनाई, उत्साहहीनता, आलस्य, हाथ-पैरों में शून्यता, शरीर में भारीपन, तन्द्रा तथा बालों का जटिलीभाव।
ऐसे लक्षणों को देखकर घर के लोग श्री राजमणि द्विवेदी जी को अंग्रेजी चिकित्सा में ले गये जहाँ ‘प्रमेह’ जैसी अवधारणा ही नहीं है। उन्होंने खून जाँच करायी, बता दिया कि आपको शुगर है और शुरू कर दी गोलियाँ जिससे खून में तो ‘ब्लड शुगर’ कम या नार्मल मिलने लगता है पर रोग का मूल कारण मिटता नहीं, रोगी इस भ्रम में रहता है कि उसका शुगर ठीक है परिणाम कुछ दिन में यह आता है कि रोगी के मर्मावयव (हार्ट, किडनी, यकृत आदि) रोगाक्रान्त होने लगते हैं। यही श्री द्विवेदी जी के साथ में ७९ साल में हुआ।
प्रमेह में भी मूत्र में मक्खियाँ लगती हैं, इससे यह अनुमान होता है कि मूत्र में मिठास भी हो सकती है और पूय आदि गन्दगी भी।

यह बात कश्यप संहिताकार लिखते हैं-

गौरवं बद्धता जाड्यमकस्मान्मूत्र निर्गम:।
प्रमेहे मक्षिकाक्रान्तं मूत्रं श्वेतं घनं तथा।।
का.सं.सू. २५/१६।।

२ जून २०१९ को बुखार आया तो फिर उसी नागपुर अंग्रेजी अस्पताल में ले गये वहाँ उन्होंने जाँच की तो बताया कि यूरिया, क्रिटनीन बढ़ गया है, अब आपकी दोनों किडनी फेल हो गयी हैं। उन्होंने डायलेसिस शुरू कर दी। आगे जो दुर्दशा हुयी वह लिखी ही जा चुकी है।
दरअसल शुगर के रोगियों में भरपूर जागरूकता लाने की जरूरत है कि अंग्रेजी पद्धति में जो शुगर का इलाज किया जा रहा है वह इलाज नहीं केवल रक्त में शुगर को नार्मल दिखाने का कर्मकाण्ड मात्र है।

श्री द्विवेदी  जी में आगे की रोग सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हुयी-

प्रमेह ➡️ धातुक्षय ➡️ ओजक्षय ➡️ वातप्रकोप ➡️ अग्नि व्यापार क्रम असंतुलन ➡️ वृक्कसन्यास (सीआरएफ)।

आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालयम् में जब रक्त परीक्षण कराया तो हेमोग्लोबिन ९.४ जीएम %, यूरिया ११५.१, क्रिटनीन ६.६, सोडियम १२८.५, पोटेशियम ५.७, सीआरपी ६८.८ आया। मूत्र में प्रोटीन २+ में आया।

अब चिकित्सा व्यवस्था करनी थी।

 भगवान् पुनर्वसु के निर्देशक सूत्र-
‘‘तत्र प्रधानोव्याधि: व्याधेर्गुणभूत उपद्रव: तस्य प्राय: प्रधानप्रशमे प्रशमो भविति।
स तु पीडाकरो ... ... ... त्वरमाणोबाधेत।।’’
च.चि. २१/४०

के अनुसार व्याधि के उपद्रवों की चिकित्सा शीघ्र करनी चाहिये क्योंकि ये पीड़ाकर होते हैं।

श्री द्विवेदी जी को तुरन्त ‘आयुष ग्राम चिकित्सालयम्’ की आईपीडी में भर्ती किया गया और निम्नांकित चिकित्सा क्रम तैयार किया गया-
➡️ जराजन्य वातशामक किन्तु वृक्क (किडनी), हृदय संस्थान  में कार्यकारी ।
➡️ धात्वाग्नि समकारक और धात्वाग्नि मन्दता से उत्पन्न, धात्वामनाशक।
➡️ पाचकाग्निवर्धक, अरोचक नाशक, ओजवर्धक।
दरअसल हर रोगी को आयु भी चाहिए और बल भी तो हमें निम्नांकित सूत्र के अनुसार कार्य करना होगा। 

क्योंकि इसमें पाचकाग्नि रक्षण और आयु तथा बल तीनों की बात कही गयी है-

अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तृणामधिपो मत:।
तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मका:।।
तस्मात्तं विधिवद् युक्तैरन्नपानेन्धनैहिर्तै:।
पालयेत् प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बलस्थिति:।।
च.चि. १५/३९-४०।।

इस प्रकार शरीर में रहने वाली सभी अग्नियों में पाचकाग्नि ही प्रधान है, इसके द्वारा ही अन्य सभी अग्नियों का पोषण, पालन, संरक्षण होता है। इसलिए पाचकाग्नि का संतुलन आवश्यक है क्योंकि इसी पर आयु और बल की स्थिति निर्भरता है।

तद्नुसार दशमूलपंचकोलघन ५०० मि.ग्रा., अभ्रकभस्म सहस्त्रपुटी १२५ मि.ग्रा., शु. शिलाजीत १२५ मि.ग्रा. और स्वर्ण भस्म ५० मि.ग्रा. यशद भस्म २५ मि.ग्रा. सभी घोंटकर १྾३। यह योग राजमणि जी में धात्वाग्निवर्धक, धात्वामनाशक, रक्तपाचक, हृद्य, प्राणवहस्रोतस् विकृति विदारक बनता था।

➡️ द्राक्षादि क्वाथ (अ.हृ.) २० मि.ली., इन्दुकान्त क्वाथ २ चम्मच समभाग जल उबालकर ठण्डा किया हुआ जल मिलाकर दिन में ४ बार। यह जराजन्य वातशामक अरोचक नाशक, बलवर्धक और पाचकाग्निवर्धक है।

पंचकर्म चिकित्सा में केवल वृक्क स्वेद, क्षीतिक्तबस्ति दी गयी और पथ्याहार में केवल विलेपी।

एक सप्ताह में रोगी के बल, ऊर्जा में वृद्धि होने लगी, थोड़ी अरोचकता दूर हुयी। रक्त परीक्षण कराया तो-
यूरिया ११५.१ से बढ़कर १४०.७, क्रिटनीन ६.६ से बढ़कर ७.२, सोडियम १२८.५ से बढ़कर १३१.६, सीआरपी ६८.८ से घटकर ६४.१ हो गया।

रोगी के बेटे थोड़ा परेशान हुये कि पैथालॉजी जाँच में यूरिया आदि बढ़ गया। उन्हें आश्वस्त किया गया कि पैथालोजिकल परिणाम भले ही सकारात्मक न हों पर शारीरिक रूप से सुधार है। आप चिन्ता न करें। एक सप्ताह में ही रक्तजाँच रिपोर्ट भी सकारात्मक आयेगी।
दूसरे सप्ताह में बस्तिक्रम परिवर्तित किया गया तथा औषध व्यवस्था पत्र इस प्रकार दिया गया-
➡️ माहेश्वर वटी २ ग्राम, अभ्रक भस्म सहस्रपुटी १ ग्राम, टंकण भस्म ३ ग्राम, शटी घनसत्व १५ ग्राम घोटकर २४ मात्रा। १྾३ गोदुग्ध से।
➡️ सुकुमार क्वाथ २० मि.ली. अर्क गावजवाँ १० मि.ली. हर ३ घण्टे में ४ बार।
➡️ काकमाची, भूम्यामलकी, पुनर्नवा, शरपुंखा और सारिवा घनसत्व मिलाकर मिश्रित मात्रा ५००-५०० मि.ग्रा. हर ३ घण्टे में ४ बार।
पथ्याहार में- विलेपी के बाद रागषाडव, मुद्ग यूष तथा यथा समय गोदुग्ध दिया जाता रहा।
एक सप्ताह बाद जब रक्त परीक्षण कराया तो यूरिया घटकर १३०.४, क्रिटनीन घटकर ६.२, सोडियम बढ़कर १३४.०, शरीर में प्रोटीन ६.५ से बढ़कर ६.९ हो गया।

पैथोलॉजिकल रिपोर्ट सकारात्मक आने पर सभी में खुशी की लहर दौड़ गयी। क्योंकि रोगी जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था।

श्री द्विवेदी की शारीरिक स्थिति में भी बहुत परिवर्तन आ गया।
अब एक माह की औषधि व्यवस्था कर श्री द्विवेदी जी को डिस्चार्ज कर दिया। पथ्याहार का निर्देश दे दिया। पथ्याहार में गोदुग्ध सेवन करने का निर्देश दे दिया। क्योंकि गोदुग्ध से उत्तम ओजस्कर और सात्म्य पदार्थ कोई दूसरा है भी नहीं।

तभी तो भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने लिखा है-
स्वादुशीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्ण पिच्छिलम्।
गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पय:।।
तदेवं गुणमेवौज: सामान्यादर्भिवर्धयेत्।
प्रवरं जीवनीयानां क्षीर मुक्तं रसायनम्।।
च.सू. २७/२१७-२१८

अर्थात् गोदुग्ध के ओज के गुण समान होने से गोदुग्ध ओज को बढ़ाता है, यह जीवनीय द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है और रसायन है। पर आजाद भारत का दुर्भाग्य देखिए भारतीयों के आलस्य, प्रमाद और अचेतना के कारण कि नई पीढ़ी गोदुग्ध से वंचित होती जा रही है, परिणाम इस नवपीढ़ी में ओजहीनता देखी जा रही है। परिणामत: उनमें ओजोव्यापद से सम्बन्धित रोग बढ़ते जा रहे हैं।

एक माह पश्चात् २८ अगस्त २०१९ श्री राममणि द्विवेदी सीधी (म.प्र.) से  चलते हुये चित्रकूट आये और अकेले आये। पूरा चिकित्सालय स्टॉफ देखकर आश्चर्य में पड़ गया कि जिस वरिष्ठ नागरिक को सवा माह पहले लादकर लाया गया था वह भव्यता पूर्वक धोती, कुर्ता पहने स्वयं दिखाने आये। रक्तपरीक्षण कराया तो-
हेमोग्लोबिन बढ़कर १०.०, ब्लडशुगर १०२.८ (फार स्टिंग), यूरिया १०३.८, क्रिटनीन ४.४ था। उन्हें एक माह की औषधियाँ लिखकर पुन: एक माह बाद बुलाया गया। ऐसी है अपने भारत की आयुष चिकित्सा।



तभी तो प्रधानमंत्री मोदी जी मंच से कह रहे हैं कि मेरी कार्यक्षमता का राज है योग, आयुर्वेद और प्राणायाम।



यदि भारत में फिर से आयुष चिकित्सा को जीवित कर दिया जाय तो श्री राममणि द्विवेदी जैसे वरिष्ठ नागरिक कष्ट मुक्त रहेंगे। एक माह के लिए निम्नांकित औषधियाँ दी गयीं-

➡️ वृहत्यादि क्वाथ २ चम्मच
➡️ वरुणादि कषाय (वृहद्) २ चम्मच
➡️ उबालकर ठण्डा किया जल ४ चम्मच।
१२ खाना के ४५ मिनट पूर्व।
➡️ माहेश्वर वटी २-२ गोली दिन में २ बार गोदुग्ध से।
➡️ सुकुमार टेबलेट २-२ गोली दोपहर व रात में।
➡️ रात में गन्धर्वहस्तादि काढ़ा २ चम्मच समभाग जल से।



इस बार श्री द्विवेदी जी से प्रकाशनार्थ विचार माँगे गये तो उन्होंने अपने विचार दिये वे इस लेख के प्रारम्भ में प्रकाशित हैं। आशा है कि आप इस चिकित्साऽनुभव को स्वयं आत्मसात् करेंगे तथा अन्यत्र को भी प्रेषित करेंगे तथा अपने सुझावों से हमें भी अवगत करायेंगे।


आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
           आयुष ग्राम चिकित्सालयम, चित्रकूट 
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  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी                                                आयुर्वेदाचार्य, पी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.)                   एन.डी., साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि, एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )       
          प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                                                                    एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 





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