ऐसे देती आयुष चिकित्सा जीवनदान एंजियोग्राफी में मौत के संकेत पाए हार्ट, किडनी रोगी को : सफल चिकित्सा

हृदयानन्द को हृदय किडनी रोग से मिली मुक्ति!!


श्री ह्रद्यानंद सोनकर 
मेरा  नाम राजेश सोनकर है, मैं विदेश (फॉरेन) कम्पनी में जॉब करता हूँ, मेरे पिता श्री हृदयानन्द सोनकर है। मेरे पिताजी को १५ साल पहले मधुमेह हुआ, अंग्रेजी दवा खाते रहे फिर ४ साल बाद ३१ जुलाई २०१९ को दवा खाते-खाते अचानक बी॰पी॰ बढ़कर २०० एमएम/एचजी के  ऊपर पहुंच गया और शुगर ४५०एमजी/डीएल हो गया, श्वास बहुत तेज फूलने लगी, और अटैक भी आया। मैं घबराकर पिताजी को गोरखपुर के अंग्रेजी अस्पताल ले गया, वहाँ पर जांचें करवायीं गयी और ३ दिन तक आई॰.सी॰यू॰ में भर्ती रखा गया। एलोपैथी दवा चली कुछ तो आराम मिला, वहाँ जांच से बताया गया कि पिताजी की किडनी फेल है और साथ में हार्ट की समस्या है ही। कुछ खास आराम न मिलने पर मुझे पी॰जी॰ आई॰ (लखनऊ) के लिये रिफर कर दिया गया। मैं वहाँ पर गया डॉक्टरों ने जांचें देखा और कहा कि यदि एंजियोग्राफी  की जाये तो ५०प्रतिशत ब्लॉकेज होने के आसार हैं और यह भी कहा कि अगर आप एंजियोग्राफी करवाते हैं तो  इनकी जान भी जा सकती है। तो एंजियोग्राफी न करवायें यहीं ज्यादा अच्छा है। यह सब सुनकर मैं बहुत परेशान हुआ कि इतनी सारी बीमारियां हैं कितनी एलोपैथी दवा खायेंगे, कुछ खास आराम भी नहीं था। मैं सोचने लगा कि हमारे देश की यह कैसी चिकित्सा और दवाइयाँ हैं कि एक की दवा खा रहे हैं तो दूसरी बीमारी और जब दूसरी बीमारी की भी दवा शुरू कर देते हैं तो तीसरी बीमारी जब तीसरी बीमारी की दवा शुरू कर देते हैं तो हार्ट अटैक और किडनी फेल्योर जैसी जानलेवा बीमारियाँ? मैं लखनऊ से पिताजी को घर ले आया। तभी मुझे मेरे ही गांव के एक सज्जन (जो आपके आयुष ग्राम चिकित्सालय से अपना भी इलाज करवा रहे हैं) से आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट के बारे में पता चला। बहुत बड़ा संस्थान, भव्य हास्पिटल, भव्य व्यवस्था। कई डॉक्टर, नर्सें, फार्मासिस्ट, कई एकड़ में फैला यह संस्थान।
मैं यहां १२ अगस्त २०१९ दिन सोमवार को लेकर आया। यहाँ डॉ॰ अर्चना वाजपेयी, एम॰डी॰, (आयु. कायचिकित्सा) जी ने समस्यायें पूछीं और जांचे करवायीं, जांच आने के बाद १५ दिन के लिये पिताजी को भर्ती करके पंचकर्म आदि करवाने की सलाह दी।
मैंने पिताजी को १५ दिन के लिये भर्ती कर दिया और आज २६ अगस्त २०१९ को डिस्चार्ज किया गया तो मैं देख रहा हूँ कि पिताजी को ८० प्रतिशत आराम है, एलोपैथी की दवायें बिल्कुल बन्द हो गयीं।
मैं और मेरा पूरा परिवार बहुत खुश है, मुझे पछतावा है कि मेरे पिता जी जैसे ही शुगर से ग्रस्त हुये थे तभी से यदि यहाँ का  इलाज कराता शरीर में केमिकल न डालते जाते तो ६५ साल की उम्र में हार्ट, किडनी न जाते। पर आज मैं सबको सलाह देता हूँ कि केमिकल खाने से बचिये और आयुष अपनाइये। मैं दावा के साथ कहता हूूं कि मेरे पिताजी बहुत जल्द पूर्णत: स्वस्थ्य हो जायेंगे।


राजेश सोनकर पुत्र श्री हृदयानन्द,
वार्ड नं॰-०३, चिल्लूपार, बरहालगन्ज, जि॰- गोरखपुर (उ.प्र.)
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१२ अगस्त २०१९ को उ.प्र. गोरखपुर चिल्लूपार, बडहलगंज से राजेश सोनकर जी अपने पिता को लेकर आयुष ग्राम (ट्रस्ट), चित्रकूट के आयुष ग्राम चिकित्सालयम्, चित्रकूट आये, उनका नाम था हृदयानन्द। पर्चा बना, फिर अपना नम्बर आने पर मेरी ओपीडी नम्बर-५ में आये।

व्याधि वृत्तान्त में उनके पुत्र श्री राजेश सोनकर ने बताया कि -

✔️ मैं फ़ॉरेन कंपनी में जॉब करता हूँ | मेरे पिताजी को 15 साल से मधुमेह की समस्या है
अंग्रेजी दवा खाना शुरू किया |
✔️ सुगर की दवा खाते ४ साल हुए कि हाई ब्लड प्रेशर रहने लगा |
✔️ अब इसकी भी अंग्रेजी दवा शुरू कर दी |

दवा खाते रहे की ३१ जुलाई को अचानक वीपी बढकर २००
से ऊपर गया और शुगर ४५० हो गया, श्वास फूलने लगी
और हार्ट अटैक आ गया


अब पिता जी को पीजीआई, लखनऊ रिफर कर दिया गया। हम लखनऊ लेकर गये वहाँ सारी जाँचें हुयीं, एंजियोग्राफी के लिए कहा गया पर यह भी कहा गया कि एंजियोग्राफी में आपकी जान भी जा सकती है, अनुमान यह है कि आपके हार्ट की धमनियों में ५० प्रतिशत ब्लॉकेज हैं और आप एंजियोग्राफी न करवायें तो अच्छा है। हमने पीजीआई में दवाइयाँ लिखाई और पिता जी को लेकर घर चले आये। पीजीआई में डॉक्टरों ने यह भी कहा कि आगे चलकर डायलेसिस भी करनी पड़ सकती है।
तभी हमें एक व्यक्ति ने आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालय, चित्रकूट  के बारे में बताया कि यहाँ आपके पिता जी को निजात मिल सकती है तो हम यहाँ चले आये।

डॉ. अर्चना वाजपेयी ने केसहिस्ट्री, दशविध और अष्टविध परीक्षण प्रारम्भ किया। ये मेरे संरक्षण और निर्देशन में इस काम को बहुत दक्षत से किया और करती जा रही हैं।→

हृदयानन्द में रोग उत्पन्न पूरे के पूरे कारण मिल रहे थे जो कि आचार्य चरक ने बताये हैं-

गुरुस्निग्धाम्ललवणान्यतिमात्रं समश्नात्।
नवमन्नं च पानं च निद्रामास्यासुखानि च।
त्यक्त व्यायाम चिन्तानां संशोधनमकुर्वताम्।।
च.सू. १७/७८-७९।।

श्री हृदयानन्द में पाया कि इनमें मधुमेह के संतर्पक कारण थे। गरिष्ठ, चिकनाई युक्त द्रव्य, नमकीन और अम्ल रस का खूब सेवन, निद्रा का खूब सेवन, शारीरिक श्रम का अभाव, कभी भी पंचकर्म द्वारा शरीर शोधन न कराना कफ प्रकोप  मन्दाग्नि  आम विष का निर्माण  मर्गावरण  वात प्रकोप  ओजक्षय  मधुमेह।

इस प्रकार हो गया मधुमेह और अंग्रेजी डॉक्टरों ने शुरू कर दी मधुमेह की गोलियाँ। अब व्याधि आगे बढ़ी तो-

मधुमेह  तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष (अंग्रेजी) दवाओं का प्रयोग और कुचिकित्सा  वात का गुणात्मक प्रकोप  व्यानवायु की विकृति  मिथ्यागति से रक्तसंवहन  रक्तगतवात (उच्च रक्तचाप)।
इस प्रकार इन्हें अब हाई ब्लडप्रेशर हो गया। उसकी गोलियाँ खाना शुरू किया अब नई बीमारी बढ़ी-
रक्तगतवात (उच्च रक्तचाप)  उदावत्र्त  वृक्क (किडनी) संकोच एवं धमनी प्रतिचय  वृक्कमृदूकता  वृक्कसन्यास।

आयुष ग्राम में रक्त परीक्षण कराया तो हेमोग्लोबिन १०.० जीएम %, यूरिया ९५.९, क्रिटनीन ९.३, सोडियम १२७.७ (जो बहुत कम था), फास्फोरस ५.४ था।

इस प्रकार रोग के रोगी का अध्ययन स्पष्ट बताता है कि यदि मधुमेह के पूर्व रूपों की सही चिकित्सा हो जाती तो मधुमेह न होता, यदि हो गया था तो मधुमेह की ही सम्यक् चिकित्सा की जाती और अंग्रेजी दवायें न खिलाई जाती तो वायु की गुणात्मक वृद्धि न होकर व्यानवायु प्रकोप परिणामत: रक्तसंवहन की मिथ्यागति होकर रक्तगतवात (उच्च रक्तचाप) न होता।
यदि रक्तगतवात (उच्च रक्तचाप) की रुक्ष दवाइयाँ न चलाकर समूल चिकित्सा की जाती तो उदावत्र्त होकर वृक्क, हृदय प्रभावित होकर धमनी प्रतिचय (सीएडी) और वृक्कमृदूकता तथा वृक्कसन्यास (किडनी फेल्योर) न होता।
अब डॉ. अर्चना वाजपेयी ने श्री हृदयानन्द जी को आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालयम् के अन्तरंग विभाग में किया और इस प्रकार से व्याधि प्रत्यानीक चिकित्सा क्रम तैयार किया।

ध्यान रहे दोषानुसार उसके शमन के लिए औषध प्रयोग करना दोष प्रत्यानीक चिकित्सा है और किसी भी व्याधि की विशिष्ट चिकित्सा को व्याधि प्रत्यानीक चिकित्सा कहलाता हैं।
ध्यान देने की यह भी बात है कि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रसर, क्रिया काल तक ‘दोषप्रत्यानीक’ चिकित्सा उपयुक्त होती है और स्थान संश्रय तक दोष-दूष्य चिकित्सा यानी उभय प्रत्यानीक चिकित्सा किन्तु व्यक्तावस्था, भेदावस्था तक में व्याधि प्रत्यानीक चिकित्सा करने का निर्देश प्राप्त है। व्यक्तावस्था में व्याधि की विशिष्ट चिकित्सा और ‘भेदावस्था’ में जीर्णव्याधि की विशिष्ट चिकित्सा की जाती है।

  चिकित्सा-

आचार्य चरक कहते हैं-

‘‘अथामजं लंघनपाचनक्रमैर्विशोधनैरुल्वणदोषमादित:।।’’
च.चि. १२/१६।।

अर्थात् यदि आमदोष के कारण शोथ की उत्पत्ति हो तो लंघन, पाचन चिकित्सा देनी चाहिए। दोषों की अधिक वृद्धि के कारण शोथ हुआ तो वमन, विरेचन कराना चाहिए। किन्त ‘हृदयानन्द’ में इतनी दुर्बलता थी अत: ‘विरेचन’ क्रिया को वह ले नहीं पाता तो -

इस स्थान पर आचार्य चरक के सूत्र-

‘‘दुर्बलो योऽविरेच्य: स्यात् तं निरूहैरुपाचरेत।। 
च.चि. २८/८६।।

यानी दुर्बल और ऐसा व्यक्ति जिनका विरेचन न कराया जा सकता हो उसे निरूहवस्ति से उपचारित करना चाहिए।’’ के निर्देशानुसार निम्नांकित ढंग से चिकित्सा विहित की-

  पाचनामृत कषाय २० मि.ली. उबालकर ठण्डा किया  जल मिलाकर प्रात: ६ बजे।
  अष्टमूर्ति रस २ ग्राम, माहेश्वर वटी २ ग्राम,, प्रवालपंचामृत  मु.यु. ३ ग्राम, अमृताघनसत्व १० ग्राम, स्वर्णवंग १ ग्राम  घोंटकर १६ मात्रा। १x२।
दशमूल पंचकोल क्वाथ १५-१५ मि.ली. उबालकर ठण्डा  किया जल मिलाकर दिन में २ बार।
तीन तक उपर्युक्त चिकित्सा से निराम लक्षण प्राप्त हुये। अब निरूहवस्ति का प्रयोग किया गया।

भगवान् पुनर्वसु आत्रेय जी का स्पष्ट निर्देश है कि-

विमुक्तामप्रदोषस्य पुन: परिपक्वदोषस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्थापनानुवासनम् ... ... ...।।
च.वि. २/१३।।

यानी आमदोष के मुक्त हो जाने तथा दोषों का पाचन हो जाने पर और अग्नि प्रदीप्त हो जाने पर ही निरूह, अनुवासन का प्रयोग करें। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो रोगी का रोग निवारण तो दूर होगा नहीं बल्कि जानलेवा उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं।

चौथे दिन से गन्धर्वहस्तादि क्वाथ, सैन्धव लवण, मधु मिश्रित कर निरूह वस्ति लगातार २ दिन तक। इसी दिन- हृदवस्ति, वृक्कस्वेद भी दिया गया।
पंचकर्म चिकित्सा क्रम और उपर्युक्त औषधि क्रम तथा पथ्य चलता रहा।

एक सप्ताह में शोथ मिट गया, साँस फूलना, वमन, अरुचि, उच्च रक्तचाप मिट गया। रोगी की भोजन में रुचि होने लगी।
दूसरे सप्ताह निम्नांकित चिकित्सा परिवर्तन की, क्योंकि रोगी में हृदयशोथ के लक्षणों की सम्प्राप्ति हो रही थी। कई बार बाह्यशोथ तो मिट जाता है पर आन्तरिक अवयवों में शोथ स्थानसंश्रय किए रहता है। यदि चिकित्सक चूक गया तो मर्मावयवों के रोग वापस लौटने लगते हैं।

अब निम्नांकित चिकित्सा व्यवस्था दी गयी-

माहेश्वर वटी ३ ग्राम, हृदयार्णव रस ३ ग्राम, श्रेष्ठ जवाहर मोहरा २ ग्राम, प्रवालपंचामृत मु.यु. ५ ग्राम, स्वर्णवंग २ ग्राम, पुनर्नवामण्डूर, बलागुडूची घनसत्व २० ग्राम, चिरबिल्व कषायघन २० ग्राम, वंशलोचन ५ ग्राम। सभी घोंटकर ६० मात्रा। १x२ दिन में २ बार भोजन के ४५ मिनट पहले उबालकर ठण्डा किये पानी से।
→ वृहत्यादि कषाय २०, गोक्षुरादि कषाय २ चम्मच बराबर  पानी मिलाकर भोजन के १ घण्टा बाद।
आरग्वधादि गण घनसत्व (अ.हृ.) १ ग्राम रात में सोते  समय।

यह चिकित्सा व्यवस्था पत्र श्री हृदयानन्द के लिए (यूरिया,  क्रिटनीन, यूरिक एसिड आदि) विष निवारक, आम नाशक,  बल्य, रसायन, ओजस्कर, शोथघ्न, दीपन-पाचन और शोधक  रूप में तैयार हुयी।

पंचकर्म में-  स्वेदन, निरूहवस्ति, शिरोधारा, हृद्वस्ति,वृक्कस्वेद का क्रम चलता गया।
पथ्याहार में- अग्नि बल के अनुसार पेया, विलेपी ही दिया जाता रहा।

२५ अगस्त २०१९ को जब जाँच रक्त जाँच करायी तो बहुत ही उत्साहवर्धक रिपोर्ट आयी-

हेमोग्लोबिन-  १० जीएम % से बढ़कर ११ जीएम % हो गया।
ब्लड शुगर फास्टिंग- १९२.८ एमजी/डीएल से घटकर १०८.४ हो गयी।
ब्लड यूरिया- ९५.७ एमजी/डीएल से घटकर ३७.७ हो गया।
ब्लड यूरिया नाइट्रोजन- ४४.६ एमजी/डीएल से घटकर १७.६ एमजी/डीएल
क्रिटनीन- ३.६ एमजी/डीएल से घटकर १.९ एमजी/डीएल
यूरिक एसिड- ९.३ एमजी/डीएल से घटकर ६.४ एमजी/डीएल
सोडियम- १२७.७ से बढ़कर १३३.०
फास्फोरस- ५.४ से घटकर ५.१
यूरिन (मूत्र) में- एल्ब्युमिन ३ ± से घटकर २ ± हो गया।



रोगी का बेटा राजेश जो फॉरेन कंपनी  में जॉब कर रहा था उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। वह यही कह रहा था कि देश वासियों को बताया ही नहीं जाता पता नहीं था कि आयुर्वेद इतना बड़ा चिकित्सा विज्ञान है।
२६ अगस्त २०१९ को एक माह की औषधि व्यवस्था व पथ्य निर्देश के साथ हृदय, किडनी रोगी हृदयानन्द को सच्चा हृदयानन्द बनाकर डिस्चार्ज कर दिया। जाते-जाते उनसे अपने विचार देने के लिए कहा गया तो, उन्होंने जो विचार दिये वे लेख के प्रारम्भ में प्रकाशित किए हैं।
आज जिस प्रकार गलत जीवनशैली के कारण घातक और जानलेवा बीमारियाँ पैदा हो रही हैं और अज्ञानता वश व्यक्ति अंग्रेजी चिकित्सा में पहुँच रहा है, दवा खाते-खाते ६०-६५ साल की उम्र में नई-नई बीमारियों में जकड़ रहा है तो अब समय आ गया है कि पीड़ित मानव को सही दिशा दें उन्हें आयुष चिकित्सा की ओर प्रेरित करें तभी स्वस्थ और समृद्ध भारत का निर्माण हो सकता है। क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा केवल रोग के लक्षणों की न तो चिकित्सा करती और न उसे दबाती बल्कि रोग के मूल कारण की खोजकर उस पर कार्य करती है। यह पूरी दुनिया के मानवता को भारत के ऋषियों का उपहार है।




आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
           आयुष ग्राम चिकित्सालयम, चित्रकूट 
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  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी                                                आयुर्वेदाचार्य, पी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.)                   एन.डी., साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि, एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )       
          प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                                                                    एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 







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