आर्मी की तैयारी कर रहे वात के कारण अकड़ चुके युवक की सफल चिकित्साऽनुभव


३० अगस्त २०१९ को हरियाणा में प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने भाषण में देशवासियों से कहा कि मैं एक रहस्य बता दूँ कि मैं योग, प्राणायाम और आयुर्वेद का भरपूर उपयोग करता हूँ, इसी से मेरी गाड़ी अच्छी तरह से चल रही है।


इसके बावजूद यदि कोई देशवासी जागरूक न हो और मतिधीर न हो तो उसमें उसके प्रारब्ध के अलावा दोष किसका है। आयुर्वेद ऐसे सामर्थ्यवान् चिकित्सा है कि जहाँ से अंग्रेजी अस्पताल और दवाइयों की सीमा समाप्त होती है आयुर्वेद वहाँ से शुरू होता है।
‘आयुष ग्राम चित्रकूट' में ऐसी उदाहरण रोग मिल रहे हैं जिनका अंग्रेजी चिकित्सा से जीवन ही मृतप्राय हो गया था, वे नवजीवन पा रहे हैं।

ऐसा ही एक केस श्री शम्भूनाथ पाठक, उम्र ३९ वर्ष, देवपार, बरमार माफी (गोरखपुर) उ.प्र. से २८ मई २०१९ को उनके भाई लेकर आये।

✔️ रोगी पूरा अकड़ गया था।
✔️ जोड़ों से जोर-जो़र से आवाज आती थी, सूजन, भयंकर दर्द था, बुखार लगातार बना था।
✔️ भूख मर चुकी थी, पेट साफ नहीं होता था।
✔️ अंग्रेजी अस्पतालों/डॉक्टरों द्वारा रोगी एम्स (दिल्ली) तक भेजा गया, वहाँ डॉक्टरों ने बोन मैरो जाँच की सलाह दी।
✔️ एक अस्पताल में बायाँ कूल्हा बदलने की सलाह दी रोगी ने बताया कि उसके पास इतना धन न होने के कारण मैं वापस चला आया था।
✔️ अब तो मौत सामने दिख रही थी, बेड में पड़े-पड़े समय बीत रहा था, तभी गोरखपुर के डॉ. सरफुद्दीन, बीएएमएस आयुष ग्राम चित्रकूट का पता दिया तो यहाँ आये हैं।

यद्यपि रोगी को सही चिकित्सा न मिलने के कारण रोग काफी बिगड़ गया था, पर रोगी की युवावस्था होने के कारण उसमें आयु सम्पन्नता थी और उसके घर के लोग पूरी तरह से सपोर्ट करने को तैयार थे।
आयुष ग्राम चिकित्सालय: के डॉक्टरों ने रोग की सम्प्राप्ति का अध्ययन शुरू किया, उधर रक्त परीक्षण के लिए निर्देश दे दिया।
रोगी ने बताया कि वह आर्मी की तैयारी कर रहा था, खूब खाता-पिता था, दौड़ता था, एक्सरसाइज करता था कि अचानक बुखार आया, और जोड़ों में सूजन, दर्द हुआ, अंग्रेजी अस्पताल में इलाज शुरू कराया, बस वहीं से रोग बिगड़ा और जैसे बिगड़ा तो बिगड़ता ही गया।

यह बताना रोग के निदान के लिए बहुत बड़ा सूत्र था। यही से रोग का सही पता चल गया। आचार्य माधवकर बताते हैं-

विरुद्धाहारचेष्टस्य मन्दाग्नेर्निश्चलस्य च।
स्निग्धं भुक्तवतो हि अन्नं व्यायामं कुर्वतस्तथा।।
वायु प्रेरितो ह्याम: श्लेष्मस्थानं प्रधावति।।
तेनात्यर्थं विदग्धौऽसौ धमनीं प्रतिपद्यते।
वातपित्त कफैर्भूयो दूषित: सोऽन्नजो रस:।।
स्रोतांस्यभिष्यन्दयति नानावर्णोऽतिपिच्छिल:।
जनयत्याशु दौर्बल्यं गौरवं हृदयस्य च।
व्याधिनामाश्रयो ह्येष आमसंज्ञेऽतिदारुण:।।
मा.नि. २५/२-४।।

विरुद्ध आहार का लम्बे समय से सेवन जैसे दूध+मछली, दूध+नमक, दूध+फल, मूली, अग्निविरुद्ध भोजन आदि का सेवन करने (आचार्य चरक ने १८ प्रकार के विरुद्धाहार के घटक बताये हैं उनका सावधानी से पालन करना चाहिए।)

चिकनाई सेवन कर शारीरिक श्रम करना, भोजन के बिना पचे या अजीर्ण अवस्था में शारीरिक श्रम या मैथुन करना जो आजकल अधिकांश हो रहा है, जिसके कारण आमवत/आमज्वर (Rheumatiod Arthritis\ Rheumatic Fever) के रोगी बढ़ रहे हैं।

आजकल फिजियोथैरापिस्ट और जिम सेण्टर नवयुवकों को खाली पेट वसा खिलाकर व्यायाम कराते हैं, ऐसे लोग भी बाद में आमवात के रोगी होते हैं, प्राकृतिक चिकित्सालयों में भी दूध और फल एक साथ सेवन कराया जाता है। जो विरुद्धाहार है और आगे चलकर आमवात रोगी बनाता है।

अधिक भोजन, गरिष्ठ भोजन, दिन में सोना, रात में दही सेवन, अत्यधिक मल, मूत्र, वमन, पसीना, छींक, डकार, अधोवायु आदि के वेगों को रोकना भी आमवात जनक है।

यद्यपि वर्तमान चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांग हृदय आदि प्राचीन ग्रन्थों में ‘आमवात’ रोग का वर्णन मिलता है किन्तु चरक संहिता में वर्णित दो योगों के गुण उपयोग में ‘कंसहरीतकी’ च.चि. १२/५२ और ‘विशालादि फण्ट’ च.चि. १६/६२-६३ में ‘आमवात’ का उल्लेख है। इससे यह सिद्ध होता है कि आचार्य चरक को ‘आमवात’ का ज्ञान था, संभव है चरक संहिता का वह भाग जिसमें ‘आमवात’ का उल्लेख था वह खण्डित हो। पर आचार्य माधवकर ने अच्छी तरह से वर्णन किया है।

शम्भूनाथ पाठक में रोग की सम्प्राप्ति इस प्रकार निर्मित हुयी-

विरुद्ध खान-पान जीवनशैली ➡️ अग्निमांद्य ➡️ आमदोषोत्पत्ति (वात के संयोग से) ➡️ धमनियों द्वारा सर्वशरीर में संचरण ➡️ दूषित आम का श्लेष्म स्थानों में (त्रिक, उर:, आमाशय, हृदय, संधि स्थानाश्रय ➡️ रसवहस्रोतोदुष्टि (संग प्रकार की दुष्टि) ➡️ शोथ, जकड़ाहट, गौरवता, ज्वर, संधिशूल, हृद्दौर्बल्य लक्षणों की व्यक्ति ➡️ आमवात व्याधि।

योगरत्नाकर ने लिखा हैं-

मन्यापृष्ठकटीजानुत्रिकसन्धीन्विकुञ्चयन् ।
सशब्द: स्रस्तगात्रश्च आमवात: स उच्यते ।।

मन्या, पीठ, कमर, घुटना तथा त्रिकसंधि का संकुचित होना गात्रों में शब्द होना अंगों का ढीला होना ये लक्षण होते हैं जो कि शम्भूनाथ में पाये जा रहे थे।

रक्तपरीक्षण करया तो सीआरपी ६६.७ एमजी/डीएल पाया गया जो सामान्य से ११ गुना अधिक था।
इस प्रकार रोग का निर्धारण तो हो गया और रक्तपरीक्षण में भी सीआरपी का बढ़ा होना चयापचय विकृति, आमरस की निर्मिति और अग्निमांद्य का संकेत कर रहा था। एलोपैथ के अस्पताल और चिकित्सक केवल इतना ही कर देते कि आमरस का निर्माण न हो, अग्निमांद्य़ता मिट जाय तो शंभुनाथ पाठक जी अपंग और अपाहिज न होते। पर वे तो ‘आटो इम्यून डिजीज’ मानकर पेनसिलीन, क्लोरोक्वीन, कॉर्टिकोस्टेरॉइड ठोंकते रहे और रोगी अपंग होता गया।
अब चिकित्सा की ओर जब चले तो आचार्य चक्रपाणिदत्त का निम्नांकित सूत्र अवधारित हुआ-

लङ्घनं स्वेदनं तिक्तं दीपनानि कटूनि च।
विरेचनं स्नेहपानं बस्तयश्चाममारुते।।
सैन्धवाद्येनानुवास्य क्षारबस्ति प्रशस्यते।।
चक्रदत्त २५/११।।

आचार्य चक्रपाणिदत्त ने लंघन, स्वेदन, स्नेहपान, विरेचन, अनुवासन, क्षारबस्ति करने का निर्देश दिया तथा तिक्त, दीपन, कटु आहार और औषधि को प्रशस्त बताया। लंघन का तात्पर्य वायु और आकाश महाभूत प्रधान आहार, औषधि तथा पंचकर्म से है।

 शाङ्र्गधर बताते हैं-

‘लघूष्णतीक्ष्ण विशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं द्रवम्।
कठिनं चैव यद्द्रवं प्रायस्तल्लंघनं स्मृतम्।।’

कि जो द्रव्य लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, रुक्ष, सूक्ष्म, खर, द्रव एवं कठिन हो वह शरीर को हल्का करते हैं। लेकिन यहाँ तो लघुता भी लानी है और स्नेह का भी उपयोग करना है अन्यथा ‘वात’ अधिक कुपित हो जायेगा तो शूल, बेचैनी, विषमाग्नि पैदा कर देगा।
चिकित्सा व्यवस्था-
१. पाचनामृत कषाय २० मि.ली. उबालकर ठण्डा किया जल मिलाकर सुबह ६ बजे और शाम ५ बजे। औषधि के १ घण्टा पूर्व व पश्चात् कुछ नहीं सेवन करना।
२. निराम अवस्था प्राप्त होने पर गुग्गुलतिक्त घृत और सैन्धवलवण १ चुटकी मिलाकर १०,१५,२०,२५,३०,३५ ग्राम का स्नेहपान लगातार ६ दिन तक।

आयुष ग्राम चित्रकूट में प्रशिक्षित नर्सें स्नेहपान के लिए नियुक्त हैं वे पूरी तरह शास्त्रोक्त रीति से रोगी को स्नेहपान कराती हैं।
स्नेहपान के पश्चात् स्वेदन और फिर गन्धर्वहस्तादि कषाय, कुटकी चूर्ण मिश्रित क्वाथ से विरेचन।
गुग्गुलतिक्त घृत से स्नेहित करने से लंघन, स्वेदन, स्नेहन, तिक्त, दीपन, कटु, विरेचन चिकित्साक्रम की उपलब्धि हो जाती है।
सम्यक् विरेचन होने के पश्चात् शम्भूनाथ का ज्वर तो एकदम मिट गया। विरेचन के पश्चात् पेया, विलेपी, मुद्गयूष फिर आहार दिया गया। गोधूमान्न और दूध से बनी चीजें, गन्ना और गन्ना से बनी चीजें, गरिष्ठ भोजन, सलाद, ठण्डा पानी अपक्व जल सब बन्द करा दिया।

पश्चात् निम्नांकित औषध व्यवस्था पत्र विहित कर रोगी को डिस्चार्ज कर दिया ।

१. गुग्गुलु तिक्तं घृतम् ५ ग्राम नित्य सुबह ६ बजे।
२. अमृतारिष्ट २ चम्मच, इन्दुकान्त कषाय २ चम्मच, पंचतिक्त कषाय २ चम्मच उबालकर ठण्डा किया जल मिलाकर भोजन के ४५ मिनट बाद।
३. स्वर्ण समीरपन्नग रस ५ ग्राम, त्रैलोक्य चिन्तामणि रस २ ग्राम, स्वर्ण वंग, गिलोय घनसत्व १० ग्राम, कामदुधा रस मु.यु. १० ग्राम घोंटकर ६० मात्रा। १*२ दिन में दो बार। भोजन के १ मुहूत्र्त पूर्व। हर माह यह योग १० दिन बन्द रहने का निर्देश दिया। ताकि दवा के प्रति शरीर प्रतिकारक क्षमता न बना सके।
४. रात में सोते समय- एरण्ड पाक १० ग्राम चाटकर १ कप गरम पानी से।

२ माह पश्चात् पुन: पंचकर्म के लिए निर्देश दिया गया। १८ अगस्त २०१९ को रोगी के अभिभावक श्री शंभूनाथ जी को पुन: पंचकर्म हेतु लेकर आयुष ग्राम, चित्रकूट में आये उन्होंने खुशी व्यक्त की और बताया कि सर बहुत ही आराम है। पिछले बार जब हम लेकर आये तो १० हजार की गाड़ी करके आये थे, लिटाकर और कराहते हुये लाना पड़ा था। इस बार तो ट्रेन से ही लाये हैं और चलते हुये रोगी आया है।

इस बार ज्वर नहीं था, केवल कमजोरी थी। भूख लगने लगी थी, पेट साफ होने लगा। रक्त परीक्षण में सीआरपी भी कम हो गया।
पुन: पंचकर्म हेतु भर्ती किया गया फिर स्नेहपान, विरेचन और पथ्याहार दिया गया। इस बार इस प्रकार औषध व्यवस्था पत्र इस प्रकार विहित किया गया-
१. बला चूर्ण १ ग्राम, गुडुची घनसत्व ५०० मि.ग्रा., देवदारू घनसत्व २५० मि.ग्रा. सभी मिलाकर दिन में २ बार भोजन के १ घण्टा पूर्व पक्व शीत जल से।
२. सहचरादि क्वाथ १५ मि.ली., दशमूल पंचकोल क्वाथ २ चम्मच समभाग जल मिलाकर दिन में २ बार।
३. कस्तूर्यादि वटी १ गोली और त्रैलोक्य चिन्तामणि रस १ गोली मिलाकर दिन में २ बार।
४. रात में सोते समय- एरण्ड पाक १० ग्राम, १ कप गरम जल से। पथ्याहार पूर्ववत्।

यह योग क्षय हुयी धातुओं की पूर्ति कर तथा बलाधान कर ‘वात’ का शमन करेगा। क्योंकि चरक ने निर्देश दिया है कि-

बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रिया क्रम:।।  च.चि. ३/१४।।

आरोग्य ‘बल’ के अधीन है अत: चिकित्सा करते समय यह यह बात ध्यान रखने की है कि जब तक व्यक्ति में ‘वायु’ अव्याहत रहती है तभी तक ‘अग्निबल’ बढ़ता जाता है तो शरीर का ‘कफ’ हवि के रूप में काम आकर बल, ओज का भाव बनाता है और आरोग्यजनकता होती है।
डिस्चार्ज होते समय शम्भूनाथ पाठक जी ने अपने कुछ विचार व्यक्त किये वे प्रकाशित किए जा रहे हैं। निश्चित् रूप से इस लेख से देश के आमवात रोगी लाभ उठायेंगे और अन्य भी प्रेरित होंगे, आशा की किरण उनमें जागेगी।

डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी द्वारा लिखित पुस्तक  ''ह्रदय स्वास्थ्य पुस्तिका'' को घर बैठे प्राप्त करने के लिए संपर्क करें ||https://wa.me/918115192817

वात के कारण अकड़ चुके शरीर से मिली मुक्ति : आयुष चिकित्सा से


मैं आर्मी की तैयार कर रहा था। १० साल पहले मुझे अचानक से बुखार आने लगा और उठने-बैठने में समस्या होने लगी तो मुझे मेरे पिता जी गोरखपुर के हॉस्पिटल में दिखाया, वहाँ डॉक्टरों ने देखा और कुछ अंग्रेजी दवायें दीं। मुझे बुखार में तो थोड़ा आराम मिला, लेकिन मैं उठ-बैठ नहीं पा रहा था। इसलिए मुझे मेरे परिवार वाले गोरखपुर के एक सरकारी हॉस्पिटल ले गये, वहाँ के डॉक्टरों ने देखा और पेनीण्योर-१२ लाख इंजेक्शन हर १५ दिन में लगाना शुरू कर दिया। तो मुझे उस इंजेक्शन से आराम तो मिल गया लेकिन कुछ महीनों बाद पूरे शरीर में दर्द, सभी जोड़ों में सूजन, बिल्कुल सीधे अकड़न सी, न खड़े हो पाना, न तो बैठ पाना ये सभी समस्यायें शुरू हो गयीं।
अब मुझे एम्स (दिल्ली) ले गये, वहाँ डॉक्टरों ने  बायाँ कूल्हा बदलने की सलाह दी। लेकिन मेरे पास इतना पैसा न होने के कारण मैं दवा लेकर घर वापस आ गया। वहाँ एम्स से १ माह इलाज चला, लेकिन कुछ भी आराम नहीं हुआ। फिर मैं अपने गोरखपुर में ही एक होम्योपैथी डॉक्टर को दिखवाया। लेकिन कुछ दिन बाद मेरा हेमोग्लोबिन बहुत कम हो गया तो मुझे होम्योपैथी डॉक्टर ने गोरखपुर में ही दूसरे हॉस्पिटल रिफर कर दिया और खून चढ़वाने को कहा। मैं गया और ४ यूनिट खून चढ़वाया और १५ दिन भर्ती रहा और अंग्रेजी दवायें चलीं। लेकिन कोई आराम नहीं हुआ। मैं दवा लेकर घर आ गया।
मेरे पिताजी को एक डॉक्टर सरफुद्दीन, बीएएमएस ने आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालयम्, चित्रकूट का पतादिया। मैं अपने पिताजी के साथ आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट आया। यहाँ पर मेरे पिताजी ने मेरा रजिस्ट्रेशन करवाया, उसके बाद मेरा नम्बर आने पर मुझे ओपीडी में बुलाया गया और सीआरपी जाँच करवायी। जाँच में मेरा सीआरपी २९.०५.२०१९ को ५८.३ एमजी/डीएल आया। डॉक्टर साहब ने १० दिन के लिए भर्ती रखकर पंचकर्म करवाने को कहा। मैं १० दिन के लिए भर्ती हो गया। जब मैं यहाँ आया था तब मैं बिल्कुल अकड़ सा गया था और सभी जोड़ों में दर्द व सूजन, कमजोरी, बुखार आ रहा था। लेकिन जब मुझे १० दिन के बाद डिस्चार्ज किया गया तो मुझे आराम मिलना शुरू हो गया था। मेरा सीआरपी ५३ एमजी/डीएल हो गया था, मुझे बल मिलने लगा, मैं अपनी गर्दन को हल्का घुमाने लगा और सबसे अच्छी बात मेरी पूरी अंग्रेजी दवायें बन्द हो गयीं। डॉक्टर साहब ने १ माह की दवा देकर अगले २ माह बाद फिर से १० दिन के लिए पंचकर्म करवाने को बुलवाया। मैं पुन: १८.०८.२०१९ को यहाँ आया, फिर से जाँच हुयी और फिर १० दिन पंचकर्म हुआ, दवायें चलीं और आज ३०.०८.२०१९ को मुझे डिस्चार्ज किया गया। आज मुझे यहाँ से ८० प्रतिशत आराम है मैं अपने आपसे चलने लगा हूँ और अपने आपसे खा-पी लेता हूँ, गर्दन घुमाने लगा हूँ और मेरे जोड़ों में दर्द नहीं है न ही सूजन है, मेरी जाँच में आज सीआरपी घटकर ४८.४ एमजी/डीएल हो गया है। मेरी अंग्रेजी दवायें भी बन्द हैं।
मैं और मेरा पूरा परिवार आयुष ग्राम का आभारी है। मैं बहुत खुश हूँ यहाँ के चिकित्सालय और स्टॉफ से जो मुझे मिला। एलोपैथ में ऐसा कहीं स्टॉफ नहीं मिला।

शम्भूनाथ पाठक
देवपार, बरमार माफी (गोरखपुर) उ.प्र.
मोबा.नं.- ९००५९३८२७७


आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
           आयुष ग्राम चिकित्सालयम, चित्रकूट 
            मोब.न. 9919527646, 8601209999
             website: www.ayushgram.org


  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी                                                आयुर्वेदाचार्य, पी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.)                   एन.डी., साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि, एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )       
          प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                                                                    एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 

Post a Comment

0 Comments