अंग्रेजी अस्पतालों से न रुकने वाली उल्टी और खराब हो रही किडनी हुयी ठीक आयुष से!!


 जब डॉक्टरों ने कह दिया कि डायलेसिस करनी ही पड़ेगी!!

मो.अहमद खान साथ में
 उनका पुत्र वहीद अली 


मेरे अब्बू  मो. अहमद खान एक प्राइवेट नौकरी करते थे। मेरे पिताजी को २ माह पहले अचानक कुछ भी खाने से वमन हो जाता था और ज्वर भी बना रहता था, पेट में दर्द, जलन होने के कारण मैं अपने पिताजी को इलाहाबाद के आशा हास्पिटल में ले गया। वहाँ पर डॉक्टर ने जाँचें करवायीं, जाँच आने के बाद डॉक्टर ने गुर्दे में इन्फेक्शन बताया, इलाहाबाद में मुझे १० दिन की दवा दी गयी और घर भेज दिया गया। लेकिन मेरे पिता जी की उल्टियाँ बन्द नहीं हो रही थीं, हम कुछ खिलाते तो उल्टी हो जाती थी। डॉक्टरों ने कहा कि यदि उल्टी न बन्द हुयी तो डायलेसिस करना पड़ेगा।
हम बहुत परेशान थे, तभी मुझे मेरे गाँव के एक सज्जन (जो मेरे रिश्तेदार भी हैं) के द्वारा आयुष ग्राम (ट्रस्ट) के चिकित्सालय, चित्रकूट का पता चला।
मैं दूसरे दिन ही अपने पिताजी को लेकर आयुष ग्राम चिकित्सालय, चित्रकूट आया। यहाँ पर ओपीडी चल रही थी, काफी भीड़ भी थी, मेरा ३ बजे शाम को नम्बर आया। मेरे अब्बू की जाँचें करवायी गयीं, फिर डॉक्टर साहब ने नाड़ी परीक्षण किया और कहा कि पिताजी को १० दिन के लिए यहाँ पर भर्ती करना पड़ेगा, पथ्य और पंचकर्म करवाया जायेगा तो यह माने कि ये १०० प्रतिशत ठीक हो जायेंगे।
मैंने ऐसे ही किया, मैंने १० दिन के लिए भर्ती करवा दिया और
जब मैं यहाँ पर आया था तब मेरे अब्बू को बहुत परेशानी हो रही थी बुखार भी आ रहा था, खाना अच्छा नहीं लगता था, खाते ही उल्टी  हो जाती थी, शुगर की समस्या २ साल से थी, पेट साफ नहीं हो रहा था, ब्लड भी कम हो रहा था, इन सबसे मेरे अब्बू बहुत परेशान थे।
आयुष ग्राम, चित्रकूट में यह देखकर सुकून मिला कि यहाँ तो किडनी, हार्ट के बहुत रोगी भर्ती थे, लगभग सब ठीक हो रहे थे। १० दिन में यहाँ चित्रकूट में अंग्रेजी दवायें तो पहले दिन से ही बन्द हो गयीं और जिससे मेरे अब्बू बहुत परेशान थे।
आज मुझे डिस्चार्ज किया गया। जाँच हुयी तो सब नार्मल हो गया और १ माह की दवा लेकर, परहेज बताकर मुझे घर भेजा जा रहा है।
मैं और मेरे अब्बू दोनो हम बहुत खुश हैं कि जो एलोपैथी दवायें २ माह से उल्टी नहीं बन्द कर पायीं, किडनी खराब थी वह आयुष चिकित्सा से सिर्फ २ दिन में आराम मिल गया और किडनी काम करने लगी। डायलेसिस से बच गये।

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- वहीद अली पुत्र मो. अहमद खान
 सैनी रोड सिराथू, वार्ड नं.-११, जिला- कौशाम्बी (उ.प्र.)
 मोबा.नं.- ९५११४१७०३०
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७ अगस्त २०१९ को सैनी रोड सिराथू, जिला- कौशाम्बी (उ.प्र.) से वहीद अली अपने अपने अब्बू मो. अहमद खान, उम्र ५५ को लेकर आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालयम्, चित्रकूट में आये। रजिस्ट्रेशन नम्बर- M००४/३८ पर हुआ। पूरे परिवार के लोग बदहवास में थे, उन्हें लग रहा था कि कितनी जल्दी मेडिकल रिलीफ मिल जाये। रजिस्ट्रेशन हुआ। अपना क्रम आने पर ओपीडी में आये, उनकी केसहिस्ट्री ली जाने लगी।

 उन्होंने बताया कि-

२ साल से इन्हें शुगर है, अंग्रेजी दवाइयाँ खा रहे हैं।

अचानक २ माह पहले से बुखार आ रहा है, खाना अच्छा नहीं लगने लगा। कुछ भी खाते ही उल्टी हो जाती है।

☑  पेट साफ नहीं हो रहा है

  पेट फूला हुआ है, पेशाब में जलन होती है, बेहोशी।

उनका बेटा वहीद अली बताये जा रहा था कि इलाहाबाद के नर्सिंग होमों में दिखाता रहा पर कुछ भी लाभ नहीं हो रहा, जितनी अंग्रेजी दवा खिलाता हूँ उतनी ही बीमारी और बढ़ती जा रही है।

आयुष ग्राम ट्रस्ट चिकित्सालयम्, चित्रकूट में रोगी की सारी रिपोर्टें देखी गयीं तो पाया गया कि आशा हास्पिटल में करायी जाँच में- हीमोग्लोबिन ११.८ एमजी / डीएल, टीएलसी १६२००/सीयूएमएम, यूरिया ७५.२ एमजी/डीएल, क्रिटनीन २.३ एमजी/डीएल था। पेशाब में प्रोटीन ++ में आ रहा था ।
अब जब आर्युेदीय परीक्षण शुरू किया गया तो पाया गया कि मो. अहमद खान का वात और कफ दोष प्रकुपित था, जिसके कारण अग्निमांद्य एवं आमदोष (एक प्रकार विष) शरीर में बन रहा था, कफ प्रकोप के कारण ‘संग’ प्रकार का स्रोतोरोध हो रहा था जिससे खाये-पिये आहार, पानी, दूध इत्यादि का वायु द्वारा विमार्गगमन हो रहा था, परिणामत: वमन हो रहा था।

दुनियाँ के महान् भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक आचार्य चरक का यह सूत्र मो. अहमद खान में पूरी तरह मार्गदर्शन कर रहा था-

 वायुर्महास्रोतसि सम्प्रवृद्ध उत्क्लेश्य दोषांस्तत ऊध्र्वमस्यन्।
 आमाशयोत्क्लेशकृतां च मर्मप्रपीडयंश्छर्दिमुदीरयेत्तु।।
 च.चि. २०/७।।
यानी अग्निमांद्य एवं आमदोष (एक प्रकार के विष के कारण) शरीर में चयापचय की विकृति थी, टीएलसी बढ़ी हुयी थी, ईएसआर भी। सोडियम बढ़ रहा था, हेमोग्लोबिन घट रहा था और यूरिया, क्रिटनीन बढ़ता जा रहा था।
किन्तु भारत का दुर्भाग्य और इन अंग्रेजी अस्पतालों की करतूत देखिए कि अग्निमांद्य के कारण आमदोष (एक प्रकार का विष) जो शरीर में बन रहा था। वही यूरिया, क्रिटनीन आदि के रूप में सामने आ रहा था। इसे ही ठीक कर देना था किन्तु अंग्रेजी डॉक्टर  डायलेसिस करने की बात कर रहे हैं। डॉक्टरों को सोचना चाहिए कि अरे! बीमारी अभी बाल्यावस्था में है तो अभी चिकित्सा से ठीक हो जाती, क्योंकि रोगी समय से आपके पास आ गया है। यदि डायलेसिस कर देंगे तो उसी में फँसकर रह जायेगा।
पर यह भी तो है कि भारत का मानव अपने देश की महान् चिकित्सा प्रणाली ‘ आयुष’ और अच्छे आयुष संस्थान की ओर न भागकर पहले गुलामी का प्रतीक अंग्रेजी डॉक्टरी में ही तो अपने को झोंक रहा है। उसी का दुष्परिणाम पा रहा है।
इसी केस में (मो. अहमद खान) को ही ले लीजिये यदि समय पर आयुष चिकित्सा में नहीं आता तो पता नहीं क्या दशा होती? क्योंकि रोग की सम्प्राप्ति कुछ और थी➤ और अंग्रेजी डॉक्टर उसे कहाँ लिये जा रहे थे।
मोहम्मद अहमद खान को १० दिन तक भर्ती होने की सलाह दी, वे तैयार थे ही। अब उनकी चिकित्सा व्यवस्था इस प्रकार विहित की गयी-
रोगी को गोदुग्ध के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिया जाय सेवनार्थ। आयुष ग्राम ट्रस्ट, चित्रकूट में गीर नस्ल की अच्छी गौ मातायें हैं अत: रोगियों और उनके सहयोगियों के लिए शुद्ध और असली गोदुग्ध पर्याप्त हो जाता है।
रोगी को गोदुग्ध जैसा लघु, स्निग्ध, बल्य, ओजवर्धक, सात्म्य आहार इसलिए दिया गया कि आचार्य चरक ने यहाँ पर सूत्र दिया है-

 आमाशयोत्क्लेशभवा हि सर्वाश्छद्र्यो मता लंघनमेव तस्मात्।
 प्रक्कारयेन्मारुतजां विमुच्य संशोधनं वा कफपित्तहारि।।
 च.चि. २०/२०

अर्थात् सभी प्रकार के वमन (छर्दि) आमाशय में उत्क्लेश (क्षोभ) के कारण होते हैं और आमाशयोत्थ रोग में कफहर, लंघन आदि उपचार करना उचित है। इसलिए सभी छर्दि में लंघना कराना चाहिए अथवा कफ-पित्तहर विरेचन विहित है। किन्तु वातज छर्दि को छोड़कर कफ पित्तज छर्दि में लंघन और संशोधन (वमन-विरेचन) कराना चाहिए।
श्री मो. अहमद खान को वातज वमन (छर्दि) था इसलिए गोदुग्ध ही लिखा गया, इससे रोगी को लंघन जनक (लघु) आहार भी मिल गया तथा-

 प्रीणनं वृहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम्।
 जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिवर्हणम्।।

 ‘‘पथ्यं वातपित्तविकारिणाम्।।’’
 च.सू. १।।

के अनुसार पोषक, शरीर को बलदायक, धातुपौष्टिक, वीर्यवर्धक, मस्तिष्क पोषक, प्रसन्नता दायक, जीवन के लिए हितकर, थकावट निवारक और वातपित्त विकार नाशक पथ्य मिल गया।
दरअसल रोगी ने जीवन में परहेज किया नहीं था, तो पहले १-२ दिन उसे असुविधा हुयी, वह परेशान होने लगा पर कोई रास्ता भी तो नहीं था, डायलेसिस और मौत का भय था। अत: पहले मन मारकर फिर ३-४ दिन में खुशी-खुशी गोदुग्ध सेवन करने लगा।

 वातशमनार्थ, वृंहणार्थ स्नेहन-स्वेदन पूर्वक अनुवासन बस्ति वस्त्यामयान्तक घृतम् से दी गयीं। डॉ. अर्चना वाजपेयी एम.डी. (आयु. कायचिकित्सा) और शालू सचान, स्नेहा, दीप्ति, शीलू, शालिनी आदि नर्सों ने बहुत ही संवेदनशीलता रखी।

 ➤ औषधि व्यवस्था-
 १. याकूती रसायन (२१ भावना युक्त) और माहेश्वर वटी १-१ गोली मिलाकर चूसकर लेने का निर्देश।
 २. कपूर कचरी २० ग्राम, रजत सिन्दूर ५०० मि.ली. ग्राम, खताईपिष्टी ५ ग्राम को ५ बार गुलाब जल में घोंटकर ५ दिन तक २५०-२५० मि.ग्रा. की पुड़िया यहाँ रखते हैं। ये दवा दिन में ४ बार दी गयी।
 ३. गाजवाँ अर्क २-२ चम्मच हर ३ घण्टे में।
 ४. रात में सोते वक्त- षडंग क्वाथ (अष्टांगहृदय) ४ चम्मच उबालकर ठण्डा किया जल मिलाकर।

उपर्युक्त चिकित्सा से रोगी मो. अहमद खान में शारीरिक रूप से पूरी तरह से १ सप्ताह में सुधार हो गया। वमन मिट गया, कमजोरी हट गयी, रोगी घूमने-फिरने लगा, जीवन के प्रति उत्साह बढ़ गया। एक सप्ताह बाद जब रक्त परीक्षण करया तो यूरिया, सोडियम, टीएलसी सामान्य हो गया, एसजीओटी ४१.६ से घटकर ३८.६ सामान्य हो गया, पोटेशियम २.८ से बढ़कर ३.० हो गया फिर भी अभी कम था।
हमने सलाह दी कि रोगी को ७ दिन और रखना पड़ेगा। ७ दिन की चिकित्सा के बाद पुन: जाँच करायी तो हेमोग्लोबिन ११.६ से बढ़कर १२.० हो गया था, यूरिया ३२.४ और क्रिटनीन १.४, पोटेशियम ३.५ (नार्मल) हो गया था। डिस्चार्ज के दिन जब रोगी हमारी ओपीडी में आया तो देखा कि रोगी के चेहरे में खूब चमक थी।


अब दो प्रश्न हमारे बन सकते हैं कि आखिर वात प्रकोप से यूरिया, क्रिटनीन कैसे बढ़ा और वात के शमन होते-होते यूरिया, क्रिटनीन कैसे घटा, हेमोग्लोबिन कैसे बढ़ा ?


इसका उत्तर दुनिया के प्रथम शल्य वैज्ञानिक आचार्य सुश्रुत इस प्रकार देते हैं-

 प्राणापानसमानैस्तु सर्वत: पवनैस्त्रिभि:।
 ध्मायते, पाल्यते चापि स्वां स्वां गतिमवस्थित:।।
 सु.सू. ३५/२८।।

यानी प्राण वायु, समान वायु और अपान वायु यदि विकृति हो जाती है तो चयापचय प्रणाली (अग्नि व्यापार क्रम) पूरी तरह से विकृतपूर्ण हो जाता है। अब सोचिये कि कितना विज्ञान सम्मत है हमारा आयुर्वेद और हमारी शास्त्रीय व्यवस्था। पर यह ध्यान रखने की बात है कि जितनी जिसकी गुरुनिष्ठा होगी, शास्त्र उतना ही उसके साथ चलेगा।

दरअसल इस प्रकरण में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रोगी में उत्तम परिणाम इसलिए भी आया कि रोगी एकदम प्रारम्भिक अवस्था में आ गया था, रोगी का ‘इम्यून पावर’ मरा नहीं था। जबकि आयुष चिकित्सा में तभी रोगी आता है जब सब तरह से हार जाता है, जवाब हो जाता है। पूरा ‘इम्यून पावर’ मर जाता है। इसलिए हमेशा रोगी को समय से ही आयुष चिकित्सा में दिखाना चाहिए। रोगी के बेटे ने खुशी-खुशी अपने विचार जो व्यक्त किये वे लेख के प्रारम्भ में प्रकाशित किये गये हैं।


हमने बिना कुछ छिपाये रोगी का सम्पूर्ण विवरण और चिकित्सा आपके समक्ष प्रस्तुत किया ताकि दुनिया *आयुष चिकित्सा से लाभान्वित हो सके और मानवता का कल्याण हो। आपको भी लगे कि यह ‘ क्लीनिकल अनुभव’ उपयोगी है तो इसे सभी जगह शेयर करें।  और नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट जरुर करें  :
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आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट द्वारा संचालित
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  डॉ मदन गोपाल वाजपेयी                                                आयुर्वेदाचार्य, पी.जी. इन पंचकर्मा (V.M.U.)                   एन.डी., साहित्यायुर्वेदरत्न,विद्यावारिधि, एम.ए.(दर्शन),एम.ए.(संस्कृत )       
          प्रधान सम्पादक चिकित्सा पल्लव
                                  
डॉ अर्चना वाजपेयी                                                                    एम.डी.(कायचिकित्सा) आयुर्वेद 

डॉ आर.एस. शुक्ल                                                                           आयुर्वेदाचार्य 


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